Wednesday, 21 June 2017

निवेदिता मुकुल सक्सेना

विद्यर्थियों को समर्पित पल

एक एक लम्हा,,,,
गुजरता जा रहा,,,,

कीमती सा समय,,,
अपनी पहचान बता रहा,,,

जी लो हर पल,,,,
अब लौट कर न आएगा,,,,

अमूल्य बना दो इसे,,,,,,
ज़िन्दगी सवार जाएगा,,,

प्यारे हो तुम बहुत,,,,
समझ लो ये बात,,,

सुनहरे पलो में छुपा,,,
ये हीरा निकाल लो,,,,

ये पल लौट कर ना आएगा,,
बस याद छोड़ जाएगा,,,।

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

नज़रिया

करती हूं तुम पर भरोसा,
तुम्हारे वादों इरादों पर ।

,जो कहते हो सुन लेती हूं
जो दिखाते देख लेती हूं ।

क्योंकि ये शहर तुम्ही से है,
ये मान लेती हूं,,।

राष्ट्रवादी समझ कर ,तुम
पर विश्वास करती हूं।

क्योंकि तुम जनता के लिए,
खड़े हो , ये सियासि बाते।

ये राजनीति की बाते,
ये सब नही मेरे हिस्से ।

बस अब तुम पर भरोसा है,
ये में जानती हूं ।।।

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

मंदिर यहाँ

सुना है गाँव मे सब
ऋतुयें नज़र आती है
कभी जेठ की तपती धूप
कभी सावन की रिमझिम
कभी बंसन्त की फुलवारी
कभी हेमन्त की हवा

सब सपना से हुआ जब
देखा संघर्ष भी यहां
फिर जीवन की आपा धापी
में आया एक रंग नया
जो बचा उसे समेट लो यादों में
क्योंकि ये भी कीमती पल है यहां,

बोनसाई सी दुनियां
बस एक वार्तालाप यहां
ब्रज यहां, मथुरा यहां
है घर एक मंदिर यहां
फिर क्यों दोडू यहा वहां
जब सब कुछ है यहां

मंदिर यहाँ, मंदिर यहाँ

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

एक प्यारी सी मोरनी आयी
थी बड़ी घबराई ,सकुचाई
कहा आ गयी, कहा जाउ
खो गयी घर की तलाश में
घर मेरा तो टूट गया ,बिखर गया।
हरियाली था साथी मेरा बिछड़ गया
क्या कहु अपनी विरह कथा ।
दूर दूर तक ,अब उम्मीद नही
कंकरीट के जंगल मे मेरा ,
घर डूब गया, अब आदत नही
किराए से रहने की जाउ तो कहा जाउ।
जंगल सा साथी मेरा छूट गया
देख घबरा रही लोगो को ।
देखो एक दरख्वास्त है मेरी,
हाथ जोड़कर विनती मेरी
जंगल को जंगल रहने दो।
मेरा घर मुझसे मत छीनो,
एक प्यारी सी मोरनी आयी।
निवेदिता मुकुल सक्सेना

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

सबका सफ़र एक हैं लेकिन अलग अलग रफ्तार है,
और एक दिन सबको थककर सोना पाव पसार है।

अपनी अपनी तिर कमाने, अपना सर संधान हैं,
किंतु लक्ष्य घोषित करता है, किसका कहा निशान है।

मत्सय भेद जो करें उसी की होती जय जयकार है,
और एक दिन सबको थककर सोना पाव पसार है।

जिसकी जितनी भारी गठरी उतना अधिक दबाव है,
जिसकी जितनी लंबी चादर, उतना ही फैलाव है।

अपनी अपनी बांध गठरिया, जाना सबको पार है,
और एक दिन सबको थककर सोना पाव पसार है।

पीछे बंधे हाथ, अौर शर्त है सफर किससे कहे कि,
पाव का काटा निकाल दे, गुज़र रहा संघर्ष शोर गुल।

चहल पहल में जीवन है नही सिर्फ जीने का भरम है।
अौर एक दिन सबको थककर सोना पाव पसार है।

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

श्री मान जी पर वारी जाउ
बोले आउ दो मिनिट में।
बैठी बैठी पगला जाउ
इंतेजार पर आता गुस्सा ।
फिर सोचु क्या होगा इससे
फिर लगा निकाल तो लू ।
में अपनी भड़ास दिन हो या रात
आ गए अब श्रीमान जी।
मेरे नियंत्रण की सीमापार
शक्ल देखी उनकी सोचा।
फिर सोचा रहने दो यार
निकलना नही कुछ समाधान।
ये तो एक बीमारी है
आता हूं दो मिनिट में आनी है।

Monday, 19 June 2017

कहानियाँ

एक कहानी-

लेखक -- सुनील चौरे "उपमन्यु"

    *तुमको आना ही होगा*

संघर्ष करता ,जूझता परिवार मार्कण्डेय गोत्रीय। जीवन को गति प्रदान करने के लिए मास्टरी कर सुकून महसूस कर रहा था ।
परिवार में ख़ुशी की लहर दौड़ गई थी, क्योकि जन्म ली चन्द्रशेखर जी के यहाँ
दमयंती ने ।संघर्षरत परिवार दमयन्ति के आने से प्रसन्न हो गया ।कन्या जल्द ही बड़ी होती है,सो दमयन्ती भी बड़ी होती गई व माता-पिता की परिस्थितियो को भाँप कर घर सम्भालने लगी ।प्रभु जब ख़ुशी देता है ,तो बहुत देता है,दमयन्ती को एक भाई और एक बहन का सहारा और मिल गया ।
दोनों भाई बहन दमयंती में ही अपनी माँ को देखते थे क्योकि माता पिता नोकरी पर चले जाते तो दमयंती ही इनका ख्याल रखती ।
     बच्ची जब विवाह योग्य होती है तब माता पिता की चिंता बढ़ जाती है ।लिहाजा चन्द्र शेखर जी भी चिंतित थे ।इसी बीच दमयंती ने 11 वी पास कर ली ।व बी0ए0 की पढाई करने लगी ।सबको नोकरी के लिए फ़ार्म भरते देख दमयंती ने भी मास्टरी का याने उप शिक्षक का फार्म भर परिक्षा दी ,और चयन भी हो गया ।दमयंती व परिवार प्रसन्न हो गया ।
दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र में पदस्थापना हुई ।सुबह से घर का काम निपटा इंदौर लाइन पैसेंजर ट्रेन पकड़
स्कूल जाती 10-30 बजे व
शाम 5-30 बजे घर आती व अपना घर का काम बिना थके निपटाती ।
प्रतिदिन की दिन चर्या हो चुकी थी दमयंती की ।

     इधर चन्द्र शेखर जी अपनी बच्ची का प्रस्ताव ले कर उपमन्यु गोत्रीय परिवार के यहाँ पहुंचे ।
सौहार्द पूर्ण चर्चा में अमृत जैसी विचार धारा वाले अमृत जी नेकहा-हमारा लड़का तो बी0 कॉम0 ,
ए ल एल बी0 है और अभी बेकाम है ।चन्द्र शेखर जी बोले -आप चिंता न करे,हमारी बच्ची कमा रही है ।वह बहुत ही किस्मत वाली है,उसके आते ही सब शुभ ही शुभ होगा ।
  दोनों परिवारो के बीच हां होते ही चन्द्र शेखर व अमृत जी गले मिले ।व धूम-धाम से दोनों  ने दमयंती व सत्य व्रत  की सगाई कर दी ।
  दमयंती ने अपने पिय को देखा ,पिय ने दमयंती 
को देखा ।आँखों आँखों में ही दोनों ने  विश्वास जताया ।लगभग एक वर्ष तक सगाई रही ।इस एक वर्ष में दोनों ने कई सारे सपने देखे ।सत्यव्रत ट्रेन आने पर पहूँच जाता ,व पीछे पीछे घर तक छोड़ने जाता ,यही क्रम चलते रहा। 
दमयंती की सखी सहेली कहती-देख तेरा आशिक 
मंगेतर आ गया ।
दोनों के बीच  विश्वास , प्रगाड़ हो गया था ।

    फिर वह दिन भी आ गया जब शहनाइयां बज उठी ।बारात चन्द्र शेखर जी  द्वार पहूँच गई ।
लजियाती हुई,लग्नमण्डप में दमयंती आ गई ।स्त्रियों में सत्य व्रत के मतकमाऊ होने व दुबलेपन पर भी कटाक्ष हुआ ,किन्तु दमयंती  के घूर के देखने पर सब सकपका गई ।
इस घटना से सत्य व्रत दमयन्ति का हो कर रह गया ।पंडितो  के उद् घोष के साथ ही दोनों के लग्न गये याने दो दिल एक जिस्म हो गये ।
बारात बिदा की व दमयन्ती अपने नये घर में याने ससुराल में प्रविस्थ हुई जहाँ सभी ने उत्साह से स्वागत किया ।
दमयंती को दूसरे दिन ही
देवरानी मिल गई ।याने दोनों शादियां एक साथ हुई ।

   समय का चक्र चलता रहा ।दमयंती के आने के बाद से ही सत्य व्रत को एक के बाद एक नोकरी मिलती गई ।व सभी कार्य शुभ होने लगे ।सत्यव्रत 90 कि 0मी0 दूर आना जाना करने लगा ।सुबह जल्दी उठ सत्य व्रत के साथ ही अपना डिब्बा भी बना ,संयुक्त परिवार का खाना बनाना व फिर अपनी नोकरी के लिये भागते हुये पैसेंजर ट्रेन दमयंती पकड़ती व नोकरी स्थल पहूँचती ।यही दिनचर्या बन गई थी सत्य व्रत व दमयंती की ।
घर घर की कहानी ।सो वही यहाँ भी ।शिकवा शिकायत ।दमयन्ती काम नही करती ,पूरी रोटी नही बनाती ,नोकरी चली जाती है ।यह सब सुन पति अपनी पत्नी को हक से
डांटता , व मार भी देता ,किन्तु अच्छे संस्कार लिये दमयंती उफ़ तक नही करती ,न ही माता पिता को कहती ।उसके इसी गुण ने पति को जीत लिया था ।तकलीफो को
सहती हुई कई बार टेंशन में ट्रेन से गिरते बची ।
खुशियां प्रभु ने दी और तीन पुत्रो की माँ दमयन्ती को बना दिया ।संयुक्त परिवार में नोकरी करते हुये परिवार के हृदय में जगह बनाना बड़ा मुश्किल होता है,किन्तु दमयंती ने ऐसा कर दिया था ।बच्चे भी धीरे धीरे बड़े होने लगे।
एक साथ पांच लोग छोटी गाडी हीरो मैजेस्टिक पर बैठ जब निकलते तो चिर परिचित देखते ही रहते  ।
दस साल बाद दमयंती के सहयोग से स्वयम् का मकान रामनगर में बन गया था ।
संयुक्त परिवार हो व चिक चिक न हो ऐसा सम्भव नही ।रोज की अशांति से अच्छा शान्ति का मार्ग अपनाना ।सो सत्यव्रत दमयंती व बच्चों को लेकर स्वयं के मकान में जा जिंदगी चलाने लगा ।एक लौटे गिलास,से दमयंती ने गृहस्थी चालू की ।

समस्याओ से निपटते हुये बच्चों को स्कूल भेजना ,छोटे को लाद कर स्कूल ले जाना, वापिस लाना। दोनों का कार्य बन गया था। दमयंती बिना रूके,बिना टूटे ,बिना झूके ,अनवरत नोकरी करती रही ।परिवार को सम्मानजनक स्थिति में खड़ा कर दिया।
इसी बीच दमयंती का गले का आप्रेशन कर गठा ने निकाली,फिर हर्निया,फिर बड़ा आपरेशन ।सब की जांच हुई रिपोर्ट शून्य रही याने निल। बड़ा बच्चा जवाँ हुआ , उसकी शादी दमयंती ने धूम धाम से की ।लोग देखते ही रहे ।यह ख़ुशी ज्यादा दिन नही रही ।तीसरे नम्बर का बच्चा मोगी का एक्सिडेंट बड़े शहर भोपाल में हो गया। काफी दिनों तक वेंटिलेटर पर बच्चा रहा व प्रभु की कृपा से लौट कर आ गया।

इधर दमयंती को भी जटिल रोग ने घेर लिया था । सत्य व्रत के स्वयं के एक्सिडेंट भी हुए । याने सत्य व्रत के गृह सब जैसे प्रतिकूल हो। जटिल रोग से ग्रसित होने के बावजूद दृढ़ता से मौत से लड़ती रही। वही जिस ख़ुशी से बड़े बच्चे की शादी की थी ,वह ख़ुशी मिटटी में मिल गई। बहु ने कभी घर को अपना घर समझा ही नही।दोनों में प्रेम था नही। एक ऐसा बन्धन जो जैसे थोपा गया हो ,प्रतीत हो रहा था। दमयंती इस चिंता में व छोटे बच्चे की चिंता में अपना इलाज भूल गई। अनियमित हो गया। सत्य व्रत के भोलेपन की चिन्ता, वरण के विवाह की चिंता  ।
इन सबी चिंताओं के साथ दमयनती कमजोर होती चली गई ।आयुर्वेदिक ,पूजा पाठ सब किया। किन्तु सब बेकार। दमयंती ने अपने दर्द का अहसास परिवार को नही होने दिया ।सचमुच दमयंती देवी ही थी ।
दमयंती की कर्तव्य परायणता से स्टाफ भी प्रसन्न रहता था परन्तु दमयन्ती की हालत देख स्टाफ उदास हो गया था।

डॉ0 ने छै से आठ माह का समय दे दिया था ।
कमजोर होने से बीस बावीस खून की बॉटल चढ़ी । सत्य व्रत के पास आज छोटी गाडी नही बड़ी थी,दोनों साथ में ही जाते आते थे ,लेकिन अब दो तीन महीनो से सत्य व्रत अकेला ही जा आ रहा था दमयंती बिस्तर पकड़ चुकी थी । बच्चों ने सेवा में कोई कसर नही रखी थी। यह बात दमयंती भी जानती थी ।महीने गुजरते गये फिर वह अंतिम महीना मई 2017 भी आ गया ,इस महीने का अंतिम दिन 12 मई 17 का काल ग्रसित समय रात्रि 11 बजे   दमयंती ने डॉ0 के यहां इशारे से जाने से मना कर दिया ।
सत्य व्रत बच्चे पास बैठे  थे ,अचानक दमयंती उठी हाथ पैरो में तनाव ,खिंचाव,आखो का घूमना,लम्बी श्वांस का लेना ,परिवार को देख लेना व निढाल हो जाना ।सब कुछ खत्म ।

-बन्द हुई आँखे ,खेल खत्म हुआ ,ये जिंदगी है जूआ ।
आग की तरह नाते रिश्तेदारो,मित्रो में खबर फैली की दमयंती नही रही जिसको जैसा समय मिला सब आ गये । सत्य व्रत बच्चों का रो रो कर बुरा हाल था ।
अंतिम सफर में भी वह ऐसी लग रही थी नई नवेली दुल्हन ।बच्चे पति बेहाल ।चाहत रखने वाले लोंगो की भीड़ ।पतिव्रता सुहागन के अंतिम दर्शन को ततपर लोग। काँपते हाथो से अश्रु लिये सत्य व्रत ने एक चुटकी ले दमयंती की सिन्दूर से मांग भर दी । दमयंती मानो कह उठी -सुहागन भेजने हेतु धन्यवाद ।

अंतिम सफर चालू ।

दमयंती को पति बच्चो ने कांधा दे उठाते बोले-राम बोलो भाई राम । अंतिम यात्रा चालु हुई तो मुक्तिधाम पर ही रूकी ।जहाँ शरीर अग्नि के माध्यम से पंचत्त्व में मिल मुक्त हो जाता है ।दमयंती के मुख में परिवार के सदस्यों द्वारा  अंतिम बार पानी डाला गया ।प्रणाम किया ।तब तक नाते रिश्तेदारो ,गण मान्यो ने लकड़ी कण्डे जमा अंतिम शयन बिस्तर तैयार कर दिया ।दमयंती को उठा ,सुला दिया ।बड़े बच्चे जितेश ने हाथ में अग्नि ले परिक्रमा कर माँ दमयंती को अग्नि के हवाले कर दिया ।अग्नि भी जैसे सुहागन को पा कर खुश हो गई ।चन्द समय में ही दमयंती का पार्थिव शरीर अग्नि की लपटो के बीच पंचतत्वो में विलीन हो गया ।पति अपनी पत्नी बच्चे अपनी माँ को अग्नि में देखते रहे ।
दमयंती की सोच में वापिस घर कब आ गये पता ही नही चला ।सारी झंझटो से मुक्त हो गई थी मुक्तिधाम पर। घर आकर पति ने अलमारी खोली ,उसमे एक पत्र मिला-जिसमे लिखा था-ऐ!जी। न रोना। आपको भगवान ने मुझे दिया ,भगवान ने बुला लिया । तुमने और मेरे प्यारे बच्चों ने बहुत प्यार दिया ।तुम्हे व बच्चों को कैसे भुला पाउंगी । तुम्हारे आवाज देने पर दौड़ी चली
आउंगी ।तुमसे कैसे नाता तोड़ूंगी ,सात जन्मों तक तुमसे नाता जोड़ूंगी ।वह आगे और पढ़ता की आंसू चिट्ठी पर गिरे ,सत्य व्रत रोते हुये बोला -तुम ही मेरा दम हो दमयंती ।तुम ही मेरी ज्योति हो ।
मेरे लिये ,हम सब के लिये  -तुमको आना ही होगा-।

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