विद्यर्थियों को समर्पित पल
एक एक लम्हा,,,,
गुजरता जा रहा,,,,
कीमती सा समय,,,
अपनी पहचान बता रहा,,,
जी लो हर पल,,,,
अब लौट कर न आएगा,,,,
अमूल्य बना दो इसे,,,,,,
ज़िन्दगी सवार जाएगा,,,
प्यारे हो तुम बहुत,,,,
समझ लो ये बात,,,
सुनहरे पलो में छुपा,,,
ये हीरा निकाल लो,,,,
ये पल लौट कर ना आएगा,,
बस याद छोड़ जाएगा,,,।
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
नज़रिया
करती हूं तुम पर भरोसा,
तुम्हारे वादों इरादों पर ।
,जो कहते हो सुन लेती हूं
जो दिखाते देख लेती हूं ।
क्योंकि ये शहर तुम्ही से है,
ये मान लेती हूं,,।
राष्ट्रवादी समझ कर ,तुम
पर विश्वास करती हूं।
क्योंकि तुम जनता के लिए,
खड़े हो , ये सियासि बाते।
ये राजनीति की बाते,
ये सब नही मेरे हिस्से ।
बस अब तुम पर भरोसा है,
ये में जानती हूं ।।।
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
मंदिर यहाँ
सुना है गाँव मे सब
ऋतुयें नज़र आती है
कभी जेठ की तपती धूप
कभी सावन की रिमझिम
कभी बंसन्त की फुलवारी
कभी हेमन्त की हवा
सब सपना से हुआ जब
देखा संघर्ष भी यहां
फिर जीवन की आपा धापी
में आया एक रंग नया
जो बचा उसे समेट लो यादों में
क्योंकि ये भी कीमती पल है यहां,
बोनसाई सी दुनियां
बस एक वार्तालाप यहां
ब्रज यहां, मथुरा यहां
है घर एक मंदिर यहां
फिर क्यों दोडू यहा वहां
जब सब कुछ है यहां
मंदिर यहाँ, मंदिर यहाँ
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
एक प्यारी सी मोरनी आयी
थी बड़ी घबराई ,सकुचाई
कहा आ गयी, कहा जाउ
खो गयी घर की तलाश में
घर मेरा तो टूट गया ,बिखर गया।
हरियाली था साथी मेरा बिछड़ गया
क्या कहु अपनी विरह कथा ।
दूर दूर तक ,अब उम्मीद नही
कंकरीट के जंगल मे मेरा ,
घर डूब गया, अब आदत नही
किराए से रहने की जाउ तो कहा जाउ।
जंगल सा साथी मेरा छूट गया
देख घबरा रही लोगो को ।
देखो एक दरख्वास्त है मेरी,
हाथ जोड़कर विनती मेरी
जंगल को जंगल रहने दो।
मेरा घर मुझसे मत छीनो,
एक प्यारी सी मोरनी आयी।
निवेदिता मुकुल सक्सेना
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
सबका सफ़र एक हैं लेकिन अलग अलग रफ्तार है,
और एक दिन सबको थककर सोना पाव पसार है।
अपनी अपनी तिर कमाने, अपना सर संधान हैं,
किंतु लक्ष्य घोषित करता है, किसका कहा निशान है।
मत्सय भेद जो करें उसी की होती जय जयकार है,
और एक दिन सबको थककर सोना पाव पसार है।
जिसकी जितनी भारी गठरी उतना अधिक दबाव है,
जिसकी जितनी लंबी चादर, उतना ही फैलाव है।
अपनी अपनी बांध गठरिया, जाना सबको पार है,
और एक दिन सबको थककर सोना पाव पसार है।
पीछे बंधे हाथ, अौर शर्त है सफर किससे कहे कि,
पाव का काटा निकाल दे, गुज़र रहा संघर्ष शोर गुल।
चहल पहल में जीवन है नही सिर्फ जीने का भरम है।
अौर एक दिन सबको थककर सोना पाव पसार है।
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श्री मान जी पर वारी जाउ
बोले आउ दो मिनिट में।
बैठी बैठी पगला जाउ
इंतेजार पर आता गुस्सा ।
फिर सोचु क्या होगा इससे
फिर लगा निकाल तो लू ।
में अपनी भड़ास दिन हो या रात
आ गए अब श्रीमान जी।
मेरे नियंत्रण की सीमापार
शक्ल देखी उनकी सोचा।
फिर सोचा रहने दो यार
निकलना नही कुछ समाधान।
ये तो एक बीमारी है
आता हूं दो मिनिट में आनी है।
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