Saturday, 27 May 2017

नीरज पाराशर

      *रफ्तार*

कठिन के कठिनतम हो गई
जिंदगी की रफ्तार
इतनी तेज क्यों हो गई.....

मानता हूँ काम की है
समय सीमा
सफलता के लिए लेकिन
स्वस्थ जीना
छोटी छोटी मुश्किलें
क्यों विकराल हो गई.......

योजनाओं की बदलती
जटिलता
कार्य की हर समय रहती
अधिकता
सीधी सादी जिंदगी
क्यों जंजाल हो गई ......

काल्पनिक लगती है अब तो
फुरसतो की जिंदगी
कार्य के आधिक्य में फिर से
पिछड़ती जिंदगी
चेहरे की मासूमियत
क्यों खूंखार हो गई .......

                 

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

*अवसर*
 
जिंदगी बहुत अस्त व्यस्त है
पर ईश्वर की कृपा है
जीवन स्वस्थ है

काम का है बोझ इतना
बुझ गया प्रत्येक सपना
लोकहित की बात लेकर
कर रहा अटूट मेहनत
विकास की रफ्तार में
आकांक्षाए पस्त हैं ......

दिल में ये सुकून है कि
योजनाएं गतिशील है
कार्य के प्रयास से ही
कल्पनाएं फलीभूत है
हम सभी को कष्ट थोड़ा
पर आमजन मस्त है....

बन सकूँ ख़ुशी का कारण
मन की ये अभिलाषा है
योजनाएं क्रियान्वित हो
अपना सबको वादा है
मिल रहा अनमोल अवसर
ईश्वर का प्रदत्त है........

           ( स्वरचित)
          *नीरज पाराशर*
       सीईओ जनपद खण्डवा

🏡🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

        *नीरज पाराशर*
   (सीईओ जनपद खण्डवा)

     *अहसास*

चिलचिलाती धूप में
तपता है जब तन - मन
शीतलता का अहसास कराती
तेरी याद आती क्यूँ है

घुटन सी महसूस होती है
तेरे न होने से अक्सर
तू मेरे पास से दूर - दूर
इस तरह जाती क्यूँ है

तेरा होना या न होना
कराता है अहसास जिंदगी का
जिंदगी मेरी सँवरकर
बिखर जाती क्यूँ है

तेरी हर बात खनकती है
कानो में मेरे हर पल
संगीत घोलकर भी
मन में उदासी क्यूँ है

मिलकर तुझे बताएंगे "नीरज"
दिल के जख्मो की दास्तान
बिना हथियार के घायल
यादें कर जाती क्यूँ है

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

*मातृ दिवस*

सब कुछ बदल जाता है
निश्चित समय के बाद
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूं नही है......

जन्म के बाद शिक्षा
रिश्तों का अहसास
प्रकृति से परिचय
सब कुछ चरणबद्ध
सब कुछ मिलने पर भी
यादें फिसलती क्यूँ है
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूँ नही है .......

भूल जाते है हम
पहुँचकर मंजिल पर
मानवीय अहसास को
करते हम शर्मसार
रिश्तों का गला घोंटकर हमें
शर्मिंदगी क्यूँ नही है
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूँ नही है......

शर्मनाक है वर्ष में
एक दिन याद करना
जैसे सूरज से कहना
कि आज तूने धूप दी है
आत्मीय अहसास की
समझ हमे क्यूँ नही है
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूँ नही है....

सब कुछ दिया जो
सम्भव था जग में
तोलने लगते है हम
भावनात्मक अहसास को
रिश्तों के पतन का अहसास
हमे क्यूँ नही है
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूँ नही है......

                

Tuesday, 23 May 2017

प्रेरक लघु कथाएँ

🐽 *संगत का असर* 🏡

लेखक : डॉ सीमा शाहजी

एक बार एक भंवरे की मित्रता एक गोबरी कीड़े के साथ हो गई ,कीड़े ने भंवरे से कहा कि भाई  तुम मेरे सबसे अच्छे मित्र हो इस लिये मेरे यहाँ भोजन पर आओ
अब अगले दिन भंवरा सुबह सुबह तैयार हो गया और अपने बच्चो के साथ गोबरी कीड़े के यहाँ भोजन के लिये पहुँचा कीड़ा भी उन को देखकर बहुत खुश हुवा और सब का आदर करके भोजन परोसा। भोजन में गोबर की गोलियां परोसी गई और कीड़े ने कहा कि खाओ भाई रुक क्यों गए।,भंवरा सोच में पड़ गया कि मैने बुरे का संग किया इस लिये मुझे तो गोबर खाना ही पड़ेगा।भंवरा ने सोचा की ये मुझे इस का संग करने से मिला और फल भी पाया अब इस को भी मेरे संग का फल मिलना चाहिये..
भंवरा बोला भाई आज तो में आप के यहाँ भोजन के लिये आया अब तुम कल मेरे यहाँ आओगे..
अगले दिन कीड़ा तैयार होकर भंवरे के यहाँ पहुँचा ,भवरे ने कीड़े को उठा कर गुलाब के फूल में बिठा दिया और रस पिलाया, कीड़े ने खूब फूलो का रस पिया और मजे  किये अपने मित्र का धन्यवाद किया और कहाँ मित्र तुम तो बहुत अच्छी जगह रहते हो और अच्छा खाते हो..
इस के बाद कीड़े ने सोचा क्यों न अब में यहीं रहूँ और ये सोच कर यही फूल में बैठा रहा इतने में ही पास के मंदिर का पुजारी आया और फूल तोड़ कर ले गया और चढ़ा दिया इस को प्रभु चरनन में..
कीड़े को भगवन के दर्शन भी हुवे और उनके चरणों में बैठा। इस के बाद सन्ध्या में पुजारी ने सारे फूल इक्कठा किये और गंगा जी में छोड़ दिए,कीड़ा गंगा की लहरों पर लहर रहा था और अपनी किस्मत पर हैरान था कि कितना पूण्य हो गया इतने में ही भंवरा उड़ता हुवा कीड़े के पास आया और बोला की मित्र अब बताओ क्या हाल है? कीड़ा बोला भाई अब जन्म जन्म के पापो से मुक्ति हो चुकी है जहाँ गंगा जी में मरने के बाद अस्थियो को छोड़ा जाता है वहाँ में जिन्दा ही आ गया हूं ये सब मुझे तेरी मित्रता और अछि संगत का ही फल मिला है और ख़ुशी से नीहाल हु तेरा धन्यवाद जिस को में अपनी जन्नत समझता था वो गन्दगी थी और जो तेरी वजह से मिला ये ही स्वर्ग है..

किसी महात्मा ने सही कहा है:

*संगत से गुण उपजे, संगत से गुण जाए।। लोहा लगा जहाज में, पानी मे उतराय।।*

Sunday, 14 May 2017

नीरज पाराशर

*मातृ दिवस*

सब कुछ बदल जाता है
निश्चित समय के बाद
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूं नही है......

जन्म के बाद शिक्षा
रिश्तों का अहसास
प्रकृति से परिचय
सब कुछ चरणबद्ध
सब कुछ मिलने पर भी
यादें फिसलती क्यूँ है
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूँ नही है .......

भूल जाते है हम
पहुँचकर मंजिल पर
मानवीय अहसास को
करते हम शर्मसार
रिश्तों का गला घोंटकर हमें
शर्मिंदगी क्यूँ नही है
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूँ नही है......

शर्मनाक है वर्ष में
एक दिन याद करना
जैसे सूरज से कहना
कि आज तूने धूप दी है
आत्मीय अहसास की
समझ हमे क्यूँ नही है
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूँ नही है....

सब कुछ दिया जो
सम्भव था जग में
तोलने लगते है हम
भावनात्मक अहसास को
रिश्तों के पतन का अहसास
हमे क्यूँ नही है
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूँ नही है......

                 *नीरज पाराशर*
              सीईओ जनपद खण्डवा

Monday, 8 May 2017

ममता भट्ट




















मै निर्झर पथ की पथगामिनी,
मै इस निर्झर पथ की पथगामिनी,
बस मैं चलती रहती हूं निर्बाध निरंतर
रख के अपने सर पे,
अपने सपनो की पोटली,
पूरे हो न हो, वो सपने जा हैं मेरे अपने,
कोई फिक्र नहीं अनन्तर, वैसी ही
बस मैं चलती रहती हूँ निर्बाध निरन्तर,
मैं इस निर्झर पथ की पथ गामिनी।
मेरे गाँव की कंटीली,
पथरीली उस पगडंडी पर,
घर से निकली खेतों की मेड़ो पर,
धूल-धूसरित सी, ढलती शाम सी,
फिर भी बस मुस्कुराती सी, वैसी ही
चलती रहती हूं निर्बाध निरन्तर,
मैं इस निर्झर पथ....
शहर की आपाधापी में,
भीड़ भरे मॉलों में,
रेंगते वाहनों की कतारों को
चीरती, काटती, सनसनाती सी,
निकलती हूँ मैं हांफती सी, वैसी ही
चलती रहती हूँ निर्बाध निरन्तर,
मैं इस निर्झर पथ.
पहुचने को आकुल ,
व्याकुल अपने घरौंदे में,
फिर से इक टूटी-बिखरी,
ठहरी सी सांस समेटने को,
देखती हूँ घरौंदे में अपने नन्हे चूजों को,
चहकते लिपटते मुझसे,
तब चाहूँ मैं सर्वस्व हार जाना,  
क्योकि,
उन्हीं टूटे-बिखरे सपनो की पोटली सिर पे,
सूरज की रश्मियों का तेज,
फिर सुबह, ले कर निकल जाना है,
बढ़ जाना है, उसी अनन्तर राह पर,
होंगे कभी न कभी पूरे,मेरे सपने,
जो है बस सिर्फ मेरे अपने,
में इस निर्जर पथ की पथ गामिनी, वैसी ही
चलती रहती हूँ निर्बाध निरन्तर,
चलती रहूंगी निर्बाध निरंतर।
ममता अक्षय भट्ट

जब पास ही करना है तो ,
परीक्षा लेना व्यर्थ है !
जब उच्च ग्रेड ही देना है तो ,
कांपिया जांचना व्यर्थ है !
जब उपस्थित ही दिखाना है तो ,
स्कूल लगाना व्यर्थ है !
शिक्षा की इस दोहरी नीति का ,
समझ में नही आता अर्थ है !
यह वह देश था जहां ,
अग्नि परीक्षा होती थी !
कंटक राहो पर चलकर ,
कांटो पर शिक्षा होती थी !
गुरुओ के हाथो में ,
पुस्तक और डंडे होते थे !
देशभक्त बच्चे थे ,
हाथो में झण्डे होते थे !
वोट बैंक की राजनीति ने ,
व्यवस्था को बिगाड दिया !
राष्ट्रभक्ति को स्वार्थियो ने ,
जिंदा जमीं में गाड दिया !
दोहरी नीतियो के खिलाफ ,
एक भी युवा नही बोलता !
रगो में क्या पानी भरा है ,
किसी का खून क्यों नही खौलता !

Saturday, 6 May 2017

सुनील चौरे-उपमन्यु

मित्रो प्रभु से गीत के रूप में एक प्रश्न--
ऐ प्रभु ',तुमने अपने,
भक्तन को ,
चीर निद्रा में सुला दिया,
उम्र ही क्या थी उनकी अभी,
क्यों अपने पास बुला लिया?

नाम तुम्हारा ,
सदा सुमरती,
पूजा अर्चना
सदा वो करती
सदा वो
हंसती ही रहती
प्रेम प्यार में
वो बहती
प्रभु का दामन
पकड़े रहना
सदा वो सबसे
ये कहती ,
ऐ से भक्तन के साथ
प्रभु ये तुमने क्या किया,
तुमने अपने भक्तन को
चीर निद्रा में सुला दिया ।

धर्म कर्म की
थी वो देवी
मानवता की
थी वो सेवी
मन में कुछ ना
रखती थी वो
सदभाव की बोले बोली
नेक दिल और थी वो भोली
दान पूण्य में थी वो आगे
दर पे उसके जो भी आया
भर दी उसने उसकी झोली
खोलो अपने नेत्र प्रभु तुम,
देखो तड़ फ रहा है
उसका पिया,
तुमने अपनी भक्तन को
चीर निद्रा में सुला दिया ।

जन्म हुआ जब उसका तो,
उसने यह प्रण लिया,
नाम अनुरूप कर्म करूंगी"
"ज्योति"बन उजाला कर दिया ,
हंसी उसकी इतनी प्यारी,
उदासी उसने हर लिया
थी वो अच्छी पालनहार
दिया यदि किसी ने उन्हें दुःख,
तो बदले में उससे प्यार किया ।

ऐ प्रभु तुमने अपनी भक्तन को
चीर निद्रा में सुला दिया,
उम्र ही क्या थी अभी,
क्यों अपने पास बुला लिया ।

-----उपमन्यु---

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

मित्रो मन जब बोझिल हो,तो
आप जैसे सम्माननीय मित्रगण सहारा देते है,-देखे एक रचना-

बहुत उड़ी वो
बहुत उडी
मेरी सोन चिरैय्या
अथक परिश्रम करके
उसने पार लगाई
देखो मेरी नैय्या ।

थी तमन्ना उसकी
बने घोंसला
रखा उसने ,
व्या पक हौंसला
ख़ुशी के क्षण थे वो भी खूब
तीन चूजो को जन्म दिया
लाद पीठ पर उनको उसने
देखो खूब बड़ा किया
बहुत समझाया
मैंने उनको,
तनिक अब आराम कर लो
बोली वे,
मैं तो अभी थकी नही
तुम्ही थोड़ा विश्राम कर लो
मैं तो करूंगी
आराम इकट्ठा,
तब तुम काम कर लेना
आये समस्या परिवार पर तो
समस्या तुम हर लेना ,
बात हो गई सच उसकी
अचेत सी,निष्प्राण हो,
आँखे मूँदे सो रही
देते आवाज उसको हम
किन्तु,
कुछ ना वह कह रही
उड़ना ही होगा,
तुमको प्रिये,
मेरी सोन चिरैय्या
उठ ,उड़,उठ ना
प्रभु के पडू पैय्या
फिर से दे दे ताकत उसको
उड़ने की काली मैय्या
उठ कर सपने पुरे कर ले
मेरी सोन चिरैया ।
---सुनील उपमन्यु-

,🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

घूंघट में अक्षुण रखी
तुमने अपनी संस्कृति
बनी रहेगी सदैव
हृदय में तुम्हारी स्मृति
घूंघट जो उठा तो
संस्कृतिहींन मचल उठेंगे
संस्कृति को कुचलने
एक नही कई साथी जुटेंगे
घूंघट ही लाज को
कायम रख पाया है
घूंघट ने ,
अपने प्रियतम को रिझाया है
घुँघटमयी चेहर देखने हेतु
सबका प्यार उमड़ता है
तुम्हारे प्रति,
घूंघट में अक्षुण रखी है
तुमने अपनी संस्कृति ।
---उपमन्यु-

Tuesday, 2 May 2017

आर.डी. वैरागी

प्यार का गीत,

लिखती हैं, जिंदगी
मन का मीत,
लिखती हैं, जिंदगी,
प्यार का रंग हैं, जिंदगी
प्यार की उमंग हैं, जिंदगी
दिल की धड़कन हैं, जिंदगी
दिल की सांसों में हैं, जिंदगी
जीवन की खुशी हैं, जिंदगी
जीवन का गम भी हैं, जिंदगी
आती-जाती हर सांस में हैं,जिंदगी
कभी जिंदगी की हार
लिखती हैं, जिंदगी
कभी जिंदगी की जीत
लिखती हैं, जिंदगी
हर ख्वाब में हैं, जिंदगी
हर खयाल में हैं, जिंदगी
दिलों जान हैं, जिंदगी
दिलों शान हैं, जिंदगी
दिलों का गुमान हैं, जिंदगी
दिलों का अरमान हैं, जिंदगी
दिलों का नाम हैं, जिंदगी
दिलों का पैगाम हैं, जिंदगी
कहां-कहां नहीं हैं,जिंदगी
चारों तरफ हैं, जिंदगी
जीवन ही जिंदगी का नाम हैं,
जीना ही, जिंदगी का पैगाम हैं
***आर.डी.वैरागी***स्वरचित***
UR***🙏🏽📝✍🏽🌿🍃🍂👏

कहीं तो कोई
उम्मीद का दीया
जलाकर बैठा हैं,
सब एक जैसे
लिपिक भाई नहीं जो
ना उम्मीद का दीया
जलाकर बैठा हो,
जिसने दीया
जलाया ही नहीं,
बस उससे पूछना बाकी हैं
क्या तुम्हारे उम्मीद के
दीये का तेल खत्म
हो गया हैं, क्या....?
उम्मीद का दीया तो
हम भी जलाकर बैठे हैं,
कब तक यह ,मान कर बैठे
अब उजाला होने वाला हैं,
पता नहीं, अंधेरों से
निजात कब मिलेगी...।?

🙏🏽📝✍🏽आर.डी.वैरागी**
*🌾🌿🍃🍂👏

जीवन में कई,
रंग भरे हैं,
चाहत के रंग से,
कब उभरे हैं,
दिल की चाहतों ने,
कभी घाव दिये हैं,
कभी घाव भरे हैं,
जीवन में कई,
रंग भरे हैं,
चाहत के ये कितने,
नज़ाकत रिश्ते
चाहत के ये कितने,
शरारत रिश्ते,
कितने उथले,
कितने गहरे हैं,
जीवन में कई,
रंग भरे हैं,
सागर हैं, कितना गहरा
उस पर हैं, लहरों का पहरा
दरियाओं का किनारा,
उसका हैं, सहारा
सागर ने भी,
कितने जख्म सहे हैं,
जो साहिल से कहे हैं,
जीवन में कई,
रंग भरे हैं

🏽आर.डी.वैरागी*
🍀🌺💕❤💕☘💐🌾👏


🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

नींव से नभ तक इमारत--

गेती फावड़ा और तगारी
नहीं हैं कोई लाचारी
नहीं हैं कोई मजबूरी
मेहनत से
नहीं हैं कोई दूरी
श्रम के खून पसीने से
नींव से नभ तक
खड़ी की गई हैं, इमारत

शुकून हैं, उस मजदूर को
उस आलीशान भवन में
कोई रहता हैं,
रहने वाला वह मालिक
कभी नहीं सोचता
जिस में,मैं निवास करता हूं
उसमें किसी मजदूर का
कभी खून-पसीना बहा हैं,

जो आज भव्य इमारत खड़ी हैं,
वह कहाँ हैं, वह और कहीं
इसी तरह अपना,
खून-पसीना बहा रहा होगा,
किसी पेड़ के नीचे या
कोई झुग्गी-झोपड़ी बनाकर
किसी दूसरी इमारत के लिये
फिर से,मेहनत-मजदूरी
पाने का इंतज़ार कर रहा होगा

हमेशा श्रम के लिये तत्पर
अपनी पेट की आग,बुझाने के लिये
सपने बुन रहा होगा
नमन उस मजदूर को जो
आशियाना बनाता हैं
खुद जमीन पर सोता हैं,
फिर भी खुशहाल
जिंदगी जीता हैं,
यह उसके "श्रम का पुरूस्कार" हैं

       *आर.डी. वैरागी*

2

संघर्ष भी हैं जिंदगी,
हर्ष भी हैं जिंदगी
कर्ज़ भी हैं जिंदगी
फर्ज़ भी हैं जिंदगी
मर्ज भी हैं जिंदगी
दर्द भी हैं जिंदगी
दवा भी हैं जिंदगी
दुआ भी हैं जिंदगी
खेलना भी हैं जिंदगी
हंसना भी हैं जिंदगी
रोना भी हैं जिंदगी
जीद करना भी हैं जिंदगी
पढ़ना भी हैं जिंदगी
जीवन के हर रिश्तों में हैं जिंदगी

           आर.डी.वैरागी

🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄

जीवन की कोई
किताब लिखूंगा,
उसमें सुख-दुःख का,
कोई हिसाब लिखूंगा,
दिल में उठे दर्द का,
कोई जवाब लिखूंगा,
जीवन में मिले,प्यार का
कोई खिताब लिखूंगा,
आंखों में आये यदि,
गम के आंसू,
उसको मेरा,सलाम लिखूंगा
आंखों में आये यदि,
खुशी के आंसू,
उसको जीवन का,पैगाम लिखूंगा
पल-पल आये हमदर्द की याद
उसे सरेआम लिखूंगा
मोहब्बत हैं,"जिंदगी"
जो बनाई हैं, रब ने
मैं उसके नाम लिखूंगा
"मैं",मैं-नहीं
"हमदम"  उसका नाम लिखूंगा

**आर.डी.वैरागी**

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯

🙏🏽📝✍🏽गुहा साहब🇮🇳👏
शर्म आती नहीं, शर्म की जाती हैं
बेशर्मों को उनकी जबान में ही
बात की जाती हैं,
बुज़दिल ही कायराना हरकत करते हैं
हमारे जांबाज तो वतन पर
शहीद होते हैं, मरते हैं
उनकी कुर्बानी कहीं व्यर्थ न जाये
कोई फैसला ऐसा संसद से आये
हौसले जवानों के बुलंद हैं
बस ऐसी कोई, चंद छूट सेना को
मिल जाये
ना कश्मीर का राग रहेगा,
ना पाकिस्तान  रहेगा,
बस केवल पूरा, हिन्दुस्तान रहेगा

               🏽आर.डी.वैरागी**

सरफराज़ खान

कुछ हाइकु की कोशिश
देखिये

लो धराशायी
हो गये सब स्वप्न
आहत मन

पोसती धूप
अंकुरित जीवन
निखरा रूप

ढूंढ रही थी
भीतर था अमृत
कर लूं संचित

माथे का बोसा
अंकित अधर पे
रखा भरोसा

तेरा बुलावा
ख्वाबो में रंग लाया
पर सताया😢😢

अश्रूपूरित
नैनन सजनी के
भावनीहित

जीवन मृत्यु
बस दो ही नगमें
कैसी कसमें

परदेसी वो
जियरा तड़पाये
रहा न जाये

Monday, 1 May 2017

पी डी रायपुरिया

          पति वेदना

शादी नही करनी थी हम को
  नादानी मे हम तो कर गए ।
    सात भवरे पड़ी हमारी
       शादी के बंधन  में बंध गए ।1।
सुन्दर चक्षु मोहित्त चेहरा
   हम उसकी सूरत पर  मर गए ।
     बाल रेशमी चाल हिरनी
       ऐसे लालच में पड़ गए  ।2।
चन्द्र मुखी कस्तूरी गन्ध
  हम उसकी खुशवु मे वह गये ।
    गौर वदन आभा मुख मण्डल
       हँस कर के हस्ताक्षर  कर गए ।3।
कटी के नीचे मकड़ जाल में
  अलंकार के रस में सन गये ।
     ख्वाब सजाये थे हमने जो
       महुआ  जैसे हम तो झ र गये ।4।
गाय बता के दे दी शेरनी
   मेरे  पग और हस्त फूल गये ।
     कैसे कहू कहानी अपनी
        रोटी दाल के लाले पड़ गए ।5।
नई नई साड़ी रोज खरीदे
   मेरे सारे कुर्ते  फट गये  ।
      शेपिंग में खर्चा यो करती
        जैसे बाप जमाँ यहां कर गए
खर्चा इतना करत बावली
  मेरे सारे बाल बिख़र गये ।
    क्रीम पाउडर इतना पोते ।
       जैसे भाई खरीद के धर गये ।7।
नहाने की कला न आती हम को
   रेन कोट मे छेड़। जो पड़ गए ।
     दशा देख कर बोले पापा
      बेटा मेरे लाल  सुधर गये ।8।
   स्वरचित पी डी रायपुरिया

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯

रोटी ऐसी राष्ट्र में सबको स्वाद चखा य ।
कोई घूमे कार मे कोई धक्का खाय ।

कोई धक्का खाय पुरुष या हो नारी
पैसे के सब मीत देश के भस्र्टाचारी ।

विन पैसे के यार  विना पेंदा के लोटी
रायपुरिया की राय नजर में ऐसी रोटी ।

                   पी डी रायपुरिया

@@@###@@@@@

***** 01 मई मजदूर दिवस पर****

संकलन कर्ता--- मनोज चतुर्वेदी
💐💐💐💐

चंदन की लकड़ियों से चिता जल रही कहीं
कई लाशों को तो सूखी लकड़ियाँ नहीँ मिली

कई हवेलियों में रहने के लिए आदमी नहीँ;
और मजदूर को ज़रासी कुटिया नहीँ मिली

खाने वाले नहीँ,महलों में पकवान सड़ रहे
  यहाँ मजदूर को भरपेट रोटियां नहीँ मिली

फ़िल्मी नारियां पहनती पुरे वस्त्र तक नहीँ
जो तन ढंकना चाहते लंगोटियां नहीँ मिली

उनके महल रौशनी से जगमग है दिन में भी
झोंपड़ पट्टियों को चिमनियां नहीँ मिली।

कहीँ हाथ कहीं पैर कारखानो में कटे थे;
मजदूर दिवस तक भी बैसाखियाँ नहीं मिली।

रोटी वस्त्र घर क्या पानी भी लाती है दूर से
नल तो ठीक देखने को टोटियां नहीँ मिली।

फुर्सत का एक पल भी भूल से नहीँ मिला
सुख से बैठी गांव की बहू-बेटियां नहीँ मिली।

🍄🍄🍄🍄🍄🍄🍄

अज्ञान रुपी अन्धकार को
         हम मिटा सकते हैं ।
समाज की हर कुरीति को
         हम बदल सकते हैं ।
गांव क्या है राज्य को भी
         साक्षर बना सकते हैं ।
हिम्मत है यदि हम मे तो
         राष्ट्र सजा सकते हैं ।

,🍗🍋🍋🍇🍇

[28/04, 08:19]
।।।।।।।। मुक्तक ।।।।।।।।।

वरिष्ट वृद्धजनो का जो, प्यार समझ नही पाते ।
जीवन धूमिल होता है, कभी वो हँस नही पाते ।।
मिला अहसास में आकाश से बढ़कर  बुजुर्ग होते ।
बुजुर्ग निंदा जो करते है, कभी  वो सुख नही पाते ।।

🎄🎄🎄🎄🕯🕯👧।।।।।।।। बेटियां ।।।।।।।।

      ये बेटी बोलतीं है ।
मत मारो मारो मेरे बाप
क्यों करते ऐसा पाप  ।
   क्यों जन्म दिया तुमने
    तुम पूछो अपने  आप  ।
ये दुनिया  सोचती  है ।
ये बेटी बोलती  है ।

दुनिया बडी अज़ीब
  कहती है मुझको चीज ।
    सीखा नही सलिखा
      ईश सिखायो तमीज ।
माथा ठोकती  है ।
ये बेटी बोलती है ।

ये दो घरों का सार
  जैसे विना तार के तार ।
    हम जगदम्मा का रूप
      मत करना अत्याचार ।
घरों को।जोडती है ।
ये बेटी बोलती  है  ।

मै दुल्हन का हूं रूप
  मै सास बहू का स्वरूप
   मै तारों मै हूँ चन्द्र
     मै बेटों के  अनुरूप ।
डगर में डोलती है ।
ये बेटी बोलती है  ।

तुम दे दो सच्चा प्यार 
  भ्रूड को दो मत मार ।
    मै देश को दूँगी वीर
      सुखद बने संसार ।
लज्जा ओढ़ती है ।
ये बेटी बोलती है ।

भ्रूण भी है एक जीव
  गर्भ मे भी है सजीव ।
    सदी के पीछे सोच
       मै मनु श्रद्धा की नींव ।
ये राज खोलती है ।
ये बेटी बोलती है ।
   
   स्वरचित  पी डी रायपुरिया