मित्रो प्रभु से गीत के रूप में एक प्रश्न--
ऐ प्रभु ',तुमने अपने,
भक्तन को ,
चीर निद्रा में सुला दिया,
उम्र ही क्या थी उनकी अभी,
क्यों अपने पास बुला लिया?
नाम तुम्हारा ,
सदा सुमरती,
पूजा अर्चना
सदा वो करती
सदा वो
हंसती ही रहती
प्रेम प्यार में
वो बहती
प्रभु का दामन
पकड़े रहना
सदा वो सबसे
ये कहती ,
ऐ से भक्तन के साथ
प्रभु ये तुमने क्या किया,
तुमने अपने भक्तन को
चीर निद्रा में सुला दिया ।
धर्म कर्म की
थी वो देवी
मानवता की
थी वो सेवी
मन में कुछ ना
रखती थी वो
सदभाव की बोले बोली
नेक दिल और थी वो भोली
दान पूण्य में थी वो आगे
दर पे उसके जो भी आया
भर दी उसने उसकी झोली
खोलो अपने नेत्र प्रभु तुम,
देखो तड़ फ रहा है
उसका पिया,
तुमने अपनी भक्तन को
चीर निद्रा में सुला दिया ।
जन्म हुआ जब उसका तो,
उसने यह प्रण लिया,
नाम अनुरूप कर्म करूंगी"
"ज्योति"बन उजाला कर दिया ,
हंसी उसकी इतनी प्यारी,
उदासी उसने हर लिया
थी वो अच्छी पालनहार
दिया यदि किसी ने उन्हें दुःख,
तो बदले में उससे प्यार किया ।
ऐ प्रभु तुमने अपनी भक्तन को
चीर निद्रा में सुला दिया,
उम्र ही क्या थी अभी,
क्यों अपने पास बुला लिया ।
-----उपमन्यु---
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
मित्रो मन जब बोझिल हो,तो
आप जैसे सम्माननीय मित्रगण सहारा देते है,-देखे एक रचना-
बहुत उड़ी वो
बहुत उडी
मेरी सोन चिरैय्या
अथक परिश्रम करके
उसने पार लगाई
देखो मेरी नैय्या ।
थी तमन्ना उसकी
बने घोंसला
रखा उसने ,
व्या पक हौंसला
ख़ुशी के क्षण थे वो भी खूब
तीन चूजो को जन्म दिया
लाद पीठ पर उनको उसने
देखो खूब बड़ा किया
बहुत समझाया
मैंने उनको,
तनिक अब आराम कर लो
बोली वे,
मैं तो अभी थकी नही
तुम्ही थोड़ा विश्राम कर लो
मैं तो करूंगी
आराम इकट्ठा,
तब तुम काम कर लेना
आये समस्या परिवार पर तो
समस्या तुम हर लेना ,
बात हो गई सच उसकी
अचेत सी,निष्प्राण हो,
आँखे मूँदे सो रही
देते आवाज उसको हम
किन्तु,
कुछ ना वह कह रही
उड़ना ही होगा,
तुमको प्रिये,
मेरी सोन चिरैय्या
उठ ,उड़,उठ ना
प्रभु के पडू पैय्या
फिर से दे दे ताकत उसको
उड़ने की काली मैय्या
उठ कर सपने पुरे कर ले
मेरी सोन चिरैया ।
---सुनील उपमन्यु-
,🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
घूंघट में अक्षुण रखी
तुमने अपनी संस्कृति
बनी रहेगी सदैव
हृदय में तुम्हारी स्मृति
घूंघट जो उठा तो
संस्कृतिहींन मचल उठेंगे
संस्कृति को कुचलने
एक नही कई साथी जुटेंगे
घूंघट ही लाज को
कायम रख पाया है
घूंघट ने ,
अपने प्रियतम को रिझाया है
घुँघटमयी चेहर देखने हेतु
सबका प्यार उमड़ता है
तुम्हारे प्रति,
घूंघट में अक्षुण रखी है
तुमने अपनी संस्कृति ।
---उपमन्यु-
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