पति वेदना
शादी नही करनी थी हम को
नादानी मे हम तो कर गए ।
सात भवरे पड़ी हमारी
शादी के बंधन में बंध गए ।1।
सुन्दर चक्षु मोहित्त चेहरा
हम उसकी सूरत पर मर गए ।
बाल रेशमी चाल हिरनी
ऐसे लालच में पड़ गए ।2।
चन्द्र मुखी कस्तूरी गन्ध
हम उसकी खुशवु मे वह गये ।
गौर वदन आभा मुख मण्डल
हँस कर के हस्ताक्षर कर गए ।3।
कटी के नीचे मकड़ जाल में
अलंकार के रस में सन गये ।
ख्वाब सजाये थे हमने जो
महुआ जैसे हम तो झ र गये ।4।
गाय बता के दे दी शेरनी
मेरे पग और हस्त फूल गये ।
कैसे कहू कहानी अपनी
रोटी दाल के लाले पड़ गए ।5।
नई नई साड़ी रोज खरीदे
मेरे सारे कुर्ते फट गये ।
शेपिंग में खर्चा यो करती
जैसे बाप जमाँ यहां कर गए
खर्चा इतना करत बावली
मेरे सारे बाल बिख़र गये ।
क्रीम पाउडर इतना पोते ।
जैसे भाई खरीद के धर गये ।7।
नहाने की कला न आती हम को
रेन कोट मे छेड़। जो पड़ गए ।
दशा देख कर बोले पापा
बेटा मेरे लाल सुधर गये ।8।
स्वरचित पी डी रायपुरिया
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯
रोटी ऐसी राष्ट्र में सबको स्वाद चखा य ।
कोई घूमे कार मे कोई धक्का खाय ।
कोई धक्का खाय पुरुष या हो नारी
पैसे के सब मीत देश के भस्र्टाचारी ।
विन पैसे के यार विना पेंदा के लोटी
रायपुरिया की राय नजर में ऐसी रोटी ।
पी डी रायपुरिया
@@@###@@@@@
***** 01 मई मजदूर दिवस पर****
संकलन कर्ता--- मनोज चतुर्वेदी
💐💐💐💐
चंदन की लकड़ियों से चिता जल रही कहीं
कई लाशों को तो सूखी लकड़ियाँ नहीँ मिली
कई हवेलियों में रहने के लिए आदमी नहीँ;
और मजदूर को ज़रासी कुटिया नहीँ मिली
खाने वाले नहीँ,महलों में पकवान सड़ रहे
यहाँ मजदूर को भरपेट रोटियां नहीँ मिली
फ़िल्मी नारियां पहनती पुरे वस्त्र तक नहीँ
जो तन ढंकना चाहते लंगोटियां नहीँ मिली
उनके महल रौशनी से जगमग है दिन में भी
झोंपड़ पट्टियों को चिमनियां नहीँ मिली।
कहीँ हाथ कहीं पैर कारखानो में कटे थे;
मजदूर दिवस तक भी बैसाखियाँ नहीं मिली।
रोटी वस्त्र घर क्या पानी भी लाती है दूर से
नल तो ठीक देखने को टोटियां नहीँ मिली।
फुर्सत का एक पल भी भूल से नहीँ मिला
सुख से बैठी गांव की बहू-बेटियां नहीँ मिली।
🍄🍄🍄🍄🍄🍄🍄
अज्ञान रुपी अन्धकार को
हम मिटा सकते हैं ।
समाज की हर कुरीति को
हम बदल सकते हैं ।
गांव क्या है राज्य को भी
साक्षर बना सकते हैं ।
हिम्मत है यदि हम मे तो
राष्ट्र सजा सकते हैं ।
,🍗🍋🍋🍇🍇
[28/04, 08:19]
।।।।।।।। मुक्तक ।।।।।।।।।
वरिष्ट वृद्धजनो का जो, प्यार समझ नही पाते ।
जीवन धूमिल होता है, कभी वो हँस नही पाते ।।
मिला अहसास में आकाश से बढ़कर बुजुर्ग होते ।
बुजुर्ग निंदा जो करते है, कभी वो सुख नही पाते ।।
🎄🎄🎄🎄🕯🕯👧।।।।।।।। बेटियां ।।।।।।।।
ये बेटी बोलतीं है ।
मत मारो मारो मेरे बाप
क्यों करते ऐसा पाप ।
क्यों जन्म दिया तुमने
तुम पूछो अपने आप ।
ये दुनिया सोचती है ।
ये बेटी बोलती है ।
दुनिया बडी अज़ीब
कहती है मुझको चीज ।
सीखा नही सलिखा
ईश सिखायो तमीज ।
माथा ठोकती है ।
ये बेटी बोलती है ।
ये दो घरों का सार
जैसे विना तार के तार ।
हम जगदम्मा का रूप
मत करना अत्याचार ।
घरों को।जोडती है ।
ये बेटी बोलती है ।
मै दुल्हन का हूं रूप
मै सास बहू का स्वरूप
मै तारों मै हूँ चन्द्र
मै बेटों के अनुरूप ।
डगर में डोलती है ।
ये बेटी बोलती है ।
तुम दे दो सच्चा प्यार
भ्रूड को दो मत मार ।
मै देश को दूँगी वीर
सुखद बने संसार ।
लज्जा ओढ़ती है ।
ये बेटी बोलती है ।
भ्रूण भी है एक जीव
गर्भ मे भी है सजीव ।
सदी के पीछे सोच
मै मनु श्रद्धा की नींव ।
ये राज खोलती है ।
ये बेटी बोलती है ।
स्वरचित पी डी रायपुरिया
No comments:
Post a Comment