मै निर्झर पथ की पथगामिनी,
मै इस निर्झर पथ की पथगामिनी,
बस मैं चलती रहती हूं निर्बाध निरंतर
रख के अपने सर पे,
अपने सपनो की पोटली,
पूरे हो न हो, वो सपने जा हैं मेरे अपने,
कोई फिक्र नहीं अनन्तर, वैसी ही
बस मैं चलती रहती हूँ निर्बाध निरन्तर,
मैं इस निर्झर पथ की पथ गामिनी।
बस मैं चलती रहती हूं निर्बाध निरंतर
रख के अपने सर पे,
अपने सपनो की पोटली,
पूरे हो न हो, वो सपने जा हैं मेरे अपने,
कोई फिक्र नहीं अनन्तर, वैसी ही
बस मैं चलती रहती हूँ निर्बाध निरन्तर,
मैं इस निर्झर पथ की पथ गामिनी।
मेरे गाँव की कंटीली,
पथरीली उस पगडंडी पर,
घर से निकली खेतों की मेड़ो पर,
धूल-धूसरित सी, ढलती शाम सी,
फिर भी बस मुस्कुराती सी, वैसी ही
चलती रहती हूं निर्बाध निरन्तर,
मैं इस निर्झर पथ....
पथरीली उस पगडंडी पर,
घर से निकली खेतों की मेड़ो पर,
धूल-धूसरित सी, ढलती शाम सी,
फिर भी बस मुस्कुराती सी, वैसी ही
चलती रहती हूं निर्बाध निरन्तर,
मैं इस निर्झर पथ....
शहर की आपाधापी में,
भीड़ भरे मॉलों में,
रेंगते वाहनों की कतारों को
चीरती, काटती, सनसनाती सी,
निकलती हूँ मैं हांफती सी, वैसी ही
चलती रहती हूँ निर्बाध निरन्तर,
मैं इस निर्झर पथ.
भीड़ भरे मॉलों में,
रेंगते वाहनों की कतारों को
चीरती, काटती, सनसनाती सी,
निकलती हूँ मैं हांफती सी, वैसी ही
चलती रहती हूँ निर्बाध निरन्तर,
मैं इस निर्झर पथ.
पहुचने को आकुल ,
व्याकुल अपने घरौंदे में,
फिर से इक टूटी-बिखरी,
ठहरी सी सांस समेटने को,
देखती हूँ घरौंदे में अपने नन्हे चूजों को,
चहकते लिपटते मुझसे,
तब चाहूँ मैं सर्वस्व हार जाना,
व्याकुल अपने घरौंदे में,
फिर से इक टूटी-बिखरी,
ठहरी सी सांस समेटने को,
देखती हूँ घरौंदे में अपने नन्हे चूजों को,
चहकते लिपटते मुझसे,
तब चाहूँ मैं सर्वस्व हार जाना,
क्योकि,
उन्हीं टूटे-बिखरे सपनो की पोटली सिर पे,
सूरज की रश्मियों का तेज,
फिर सुबह, ले कर निकल जाना है,
बढ़ जाना है, उसी अनन्तर राह पर,
होंगे कभी न कभी पूरे,मेरे सपने,
जो है बस सिर्फ मेरे अपने,
में इस निर्जर पथ की पथ गामिनी, वैसी ही
उन्हीं टूटे-बिखरे सपनो की पोटली सिर पे,
सूरज की रश्मियों का तेज,
फिर सुबह, ले कर निकल जाना है,
बढ़ जाना है, उसी अनन्तर राह पर,
होंगे कभी न कभी पूरे,मेरे सपने,
जो है बस सिर्फ मेरे अपने,
में इस निर्जर पथ की पथ गामिनी, वैसी ही
चलती रहती हूँ निर्बाध निरन्तर,
चलती रहूंगी निर्बाध निरंतर।
चलती रहूंगी निर्बाध निरंतर।
ममता अक्षय भट्ट
जब पास ही करना है तो ,
परीक्षा लेना व्यर्थ है !
जब उच्च ग्रेड ही देना है तो ,
कांपिया जांचना व्यर्थ है !
जब उपस्थित ही दिखाना है तो ,
स्कूल लगाना व्यर्थ है !
शिक्षा की इस दोहरी नीति का ,
समझ में नही आता अर्थ है !
यह वह देश था जहां ,
अग्नि परीक्षा होती थी !
कंटक राहो पर चलकर ,
कांटो पर शिक्षा होती थी !
गुरुओ के हाथो में ,
पुस्तक और डंडे होते थे !
देशभक्त बच्चे थे ,
हाथो में झण्डे होते थे !
वोट बैंक की राजनीति ने ,
व्यवस्था को बिगाड दिया !
राष्ट्रभक्ति को स्वार्थियो ने ,
जिंदा जमीं में गाड दिया !
दोहरी नीतियो के खिलाफ ,
एक भी युवा नही बोलता !
रगो में क्या पानी भरा है ,
किसी का खून क्यों नही खौलता !
परीक्षा लेना व्यर्थ है !
जब उच्च ग्रेड ही देना है तो ,
कांपिया जांचना व्यर्थ है !
जब उपस्थित ही दिखाना है तो ,
स्कूल लगाना व्यर्थ है !
शिक्षा की इस दोहरी नीति का ,
समझ में नही आता अर्थ है !
यह वह देश था जहां ,
अग्नि परीक्षा होती थी !
कंटक राहो पर चलकर ,
कांटो पर शिक्षा होती थी !
गुरुओ के हाथो में ,
पुस्तक और डंडे होते थे !
देशभक्त बच्चे थे ,
हाथो में झण्डे होते थे !
वोट बैंक की राजनीति ने ,
व्यवस्था को बिगाड दिया !
राष्ट्रभक्ति को स्वार्थियो ने ,
जिंदा जमीं में गाड दिया !
दोहरी नीतियो के खिलाफ ,
एक भी युवा नही बोलता !
रगो में क्या पानी भरा है ,
किसी का खून क्यों नही खौलता !
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