Tuesday, 14 March 2023

भारती जी सोनी की कविताएँ

 1


भर भर पंखों में स्वछंदी

 जीत,उड़ानों को मैं पाऊं।

 मेरे अंतर्मन से मिलकर

 मेरा मन आकाश बनाऊ।

अभिलाषाओं के आंगन में

 स्नेह प्रेम की धार बहाऊँ

आँगन से आकाश में सुख के

तारो को झंकृत कर पाँउ।


 ऐसा हो परिवेश जहां से

 सूरज के नव रथ चलते हो

जीवन के पथ पर चलने

को

 जिसमे सारे श्रम लगते हो।

 तभी तपस्या की किरणों से

सुरभित मेरा जीवन होगा।


 आकाशों की नींव तले ही

 मेरा जीवन सुन्दर्य होगा।

प्रिय  बरसाती बादल बनकर ,

मेरे मन को समझाऊ।

भर भर पंखों में स्वछंदी

 जीत,उड़ानों को मैं पाऊं।



2

*बसंत उलाहना*


क्यो वसंत तुम आते हो

गीरते झरझर पात पीत हो

मर्म जहां पल जाते हो

  क्यो वसंत तुम आते है।


सिंदूरी आभामय जब तुम

 भानुदृश्य ढल जाते हो

क्यो वसंत तुम आते हो


बहती अंधवेग समीरा तब

स्वप्न बहा ले जाते हो

क्यो वसंत तुम आते है।


  *भारती सोनी झाब्बे*


3

 अक्षुण्ण सी उतरी 


अक्षुण्ण सी उतरी 

आकाशीय प्रतिमाओं की तरह,

अटल,अविभाज्य प्रेम की 

 जीवंत प्रतिमूर्ति के साथ

स्वरों के आगमन ,

जैसे

साक्षात अमर गाथाओं का 

आबद्ध प्रस्तुतिकरण।

 हे मनुज...

ईश्वरीय गाथाओं से भिन्न तो नही मानव प्रेम।

 फिर क्यो,कैसे बिखराव सम्भव हो जाता है,

 उन पलों का

 जब

 योग होने का सत्य हो,

प्रेम में

 आत्माओं के समर्पण का।



4

जब तुमने सुना


जब तुमने सुना

मेरा कहा.   ...

मैं सागर हूँ....।

 संरक्षण है मुझमे ,

वो सारे अहसास,

 दिये है उन सबने ,जो व्यथित है 

अपने मन से,

 बहुत व्याकुल है अपनी पीड़ा से,

तब से दुःखमय प्रवाहित धारा को समाहित करते रहना,कर्तव्य बन गया "मैं" का।

  दोषी है वो शब्द,

पीड़ामय वो समावेश।

मेरे आस्तित्व को छलते है,

जब जब

तुमने स्त्री ही समझा मुझे।

                   (यशोधरा)


   895  भारती सोनी

   9/4/18


5

 "मैं का वर्चस्व"

 (काव्य संग्रह आलापिनी से) 


आवर्त रचना

     ****************

      ठोकरें है पत्थरों की पत्थरों पर....।


गहन -घर्षण,

तीक्ष्ण-गर्जन,

दामिनी का तेज तर्जन.....


       ठोकरें है पत्थरों की पत्थरों पर....।


अटल -चिंतन,

हठ-अकर्मण्य,

बल-सबल सब दाँव करके


       ठोकरें है पत्थरों की पत्थरों पर....।


कभी दरकता-कोशिशों पर,

कभी लुढकता -मंजिलों तक,

पर नहीं आभास हम तक


       ठोकरें है पत्थरों की पत्थरों पर....।

(भारती सोनी झाबुआ 2017)



6

*मैं शिव आराधना* 


 अनहद की परिक्रमा में समवेत होती 

 मुग्ध हूँ, ॐकार में।

   तांडव की विकराल पदथाप से किंचित भी भयभीत नही स्वामी।

 मैं संगिनी बन सम्मोहित हूँ  अनहद में।

  भस्मी के बादल मन भावों की उड़ानों में लिप्त है तभी

तो जटाओं में विभूषित शशिराज,

 चैतन्य कर रहा है मुझे

अपने तेज से।

    सूक्ष्म जीवन के सार- असार से जागृत करता

 *ॐ* कार ही मुझमें शक्ति की संरचना करता जा रहा है प्रभु।

जय हो आपकी हे!

 शिवाधिपति

 सत्यधिपति,

सुन्दराधिपति प्रभु।

     (महा शिवरात्रि पर्व की सादर शुभकामना)

       (भारती सोनी झाबुआ)




7


 हे मानस।

मैं हूँ न

ठीक तुम्हारे अन्तः में।

ह्र्दय की उस ऊर्जावान बिंदु में, 

जहां उद्गम है ,

चिंतनरत सत्य को ढुढते  प्रवाह का,

क्रोध और विनाश को पराजित करने वाले उस सुदर्शन  नीति-रीत का।

 विवेक,धैर्य और मर्म को आत्मसात करने के सारे आयाम जुड़े है उसी बिंदु से।

 विचलित,अधीर करने वाले सारे विकृत स्वर उसकी गहराई में समाहित होकर नवीन *तेजस* राग का स्वरूप ले लेता है।

वियोगी मन से भगवा  के लक्ष्य को धारणे का भय क्यो है तुझे?

तू अकेला तो नही 

मैं हूँ न....

तेजोमत,भक्तिस्वरूप 

तेरा प्रतिरूप...."ब्रम्हास्मि"।

 (भारती सोनी झाबुआ)

15/5/21


8

 शब्दसुरभि साहित्य कला विकास ट्रस्ट, दाहोद"*


विभाग: 5 दाहोद-पंचमहाल की सीमावर्ती आदिवासी भाषा

 *जन जातीय भाषा* 

 में मेरी रचना सम्मिलित कर रही हूँ।🙏



नाम: श्रीमती भारती योगेंद्र सोनी

पता:  35/2 रामकृष्ण नगर झाबुआ (मध्य प्रदेश)

जन्म तारीख: -22/05/65

आयु:- 56

मो. नंबर- 9425909059

वॉट्स ऐप नंबर: 9425909059

यह रचना मौलिक और अप्रकाशित है।


9

रचना का शीर्षक:

 (सबरी नी पुकार)


थमु देव केवाय बदा घेर मां,       

ओ राम जी।

हूँ तो दखूं तारी बाट,

बाट देखूं तारी बाट।

थमु आवता रो

ओ राम जी ।

 हूँ तो जोवति हती बाट,

 बाट जोवति हती बाट।

 थमु आवता रो

 ओ राम जी।।


  (1) थमु तो राज धिराज 

        हमु जंगळ नी सबरी,

        तारे सीता मां रो हाथ 

        धन धन बयरी।।

        दरसन दीजो भरतार

       तमु आवता रो

        ओ राम जी।।


    (2)राज़ा दसरथ नो राज़

         बन मां बदा भेज्या राम

         भाई लछमन तारा हाथ 

         बापू-आई नी राखे वात

         ओ किदो कई नाथ

         थमु आवता रो 

         ओ राम जी।।


    (3)बोरु साख्खी ने खवाडु

         मिट्ठो ओहे तेर खवाडु

        हजु मळेनी कई ज़िमाडू

        सबरी ढाली थाई नाथ

         बिज़ी नत्थी कई वात

        थमु आवता रो

        ओ राम जी।।

 (भारती सोनी झाबुआ)

**********************

शब्दार्थ-

 जनजातीय शब्द के अर्थ हिंदी में

बदा=समस्त

सबरी=शबरी

धन-धन=धन्य-धन्य

 बयरी = पत्नी

बोरु=बोर(फल)

बिज़ी=दूसरी

 हजु =अब

ढाली= बूढ़ी ( वृद्ध)


10

 नेह,प्रेम,सामर्थ्य 

और असीम प्रांजल भावनाओं के 

द्वार से जब सत्य गुजरता है। 

तब

मौन हो जाता है 

द्वेष,ईर्ष्या,अभीप्सा का तांडव।

कौतूहल अपरिचित नही तब / 

जब सृष्टि का देवता

 "मैं" से मुझे ले जा रहा होता है,

 सन्निकर्ष में शून्य तक।

कथानक सत्य हो जाते है

  जब 

 सृष्टि के नियम

  मानव साध लेने को होता है तत्पर,

 न कोई बाधा,

न पिपासा

न ही  वाचालता

न ही घोष ....।

अद्भुत ,

सबकुछ अद्भुत 

सृष्टि दृष्टा की सूक्ष्मता का दृश्य।

 (भारती सोनी झाबुआ)


11

 ऋतुवन सघन में श्याम शरद संग,

बांचे मुख राधे संग राजे।

  जमुना लहर लहर बल खावे

शशिश्रंगार ज्यूँ मोहन भावे।


नटनागर ,गिरिराज धरण, हिय

रास रास महारास रचावे

प्रभु बन मीरा के मुरलीधर

  गिरिधर नागर श्याम कहावे।

 

रसरंग मुरली शोभित अधरा

  नेह मयूर पँखन को भाए

 श्यामा गौरी श्याम सयाने

नयन मूंद मन रास रचावे।


 श्रेष्ठ कला सो पूर्ण कलाधर

  मृदुल ह्र्दय सो जगत बताए

 राधा के गिरधर बनवारी

  मन हरले,मन मन मुस्काये।


(भारती सोनी झाबुआ)



12


सृष्टि के नेपथ्य में

तुम्हारा जननी होना

 जगत के प्रत्येक रहस्य का मूल 

 ही तो है।

अनगिनत रंगों से श्रृंगरित/ 

  स्त्रीत्व से पूर्ण /तुम्हारी भवनाओ के श्रेष्ठ मान

  राधा रूपी प्रतिबिंब में झलकते है।

  वही  अनन्त साधनाओ के तप से 

मन, आत्मा से तुम्हारा बुध्द हो जाना ही सन्सार के गतिमान होने का संदर्भ है।

   जगत के भेद अनन्त है

  राधा-कृष्ना

 यशोधरा-बुद्ध

सीता राम

नर और नारी की परिभाषाओं में।

किन्तु ...?

हाँ...श्रेष्ठ तुम स्त्री,

श्रेष्ठ तुम स्त्री

 भारती सोनी झाबुआ(7/7/21)



13


 *मेरा सत्य*

जानती हूँ

अदृश्य से परिचित अपनो को।

पहचानती हूँ

वेदनाओं के तीरंदाजों को।

देखती हूँ ,

विस्मृत सी अनुभूतियों को

 बिखरते ।

जागती हूँ,

नींदसे पराजित हो,

आश्वस्त हो प्रभात से।

अटल हूँ,

टूटते हुए विश्वासों के साथ।

कतिपय

आशान्वित हूँ 

सत्य से,

जो मुझमे सदा विराजित है 

सशक्त 

मुझमे,मेरी तरह।।।

(भारती सोनी झाबुआ)

5/7/20

[14/03, 10:10 pm] Bharti Soni: राखियां भी बोलती है जी😊

 बन्धनों के सम्मान में, 

रिश्तो के आव्हान में,

रीत के नवाचार में।

 कलाइयों को आश्वस्त करती है जब महीन रेशम की डोर,

  अलंकृत करती है अपनत्व को,

सहेजती है स्नेह को।।।

ये कच्चे रेशमी धागे

असीम शक्तियों से पूर्ण एक संकल्प है, 

जो प्रवाहित है उन मधुर रिश्तो के साथ ।

जिसमे हठ है, प्रेम है, स्नेह है, उल्लास और आनन्द है


कभी उलझे से

कभी सुलझे से

 कभी गहरे से

 कभी  हल्के से

    किन्तु एक आशान्वित पल संजो देते है ये रखियो में गुंथे धागे।।

        ( भारती सोनी झाबुआ)


14


अतीत से सीख


सीख रही हूं।

 पाट से उद्धृत ध्वनि में ओंकार का नाद ढूढ़कर

   मनन करना,चिंतन करना।


 सीख रही हूँ,

हाथो से

 गति मान होती धुरी पर  एकसार हो संतुलित होना।


 सीख रही हूं ,

कम या ज्यादा

द्रुत या बिलम्बित,

संयोजन का माप तोल,परिणामो की चिंता से।


सीख रही हूँ

 अनुशासित/नियंत्रण में रहकर  चलायमान होना।


 सीख रही हूँ

 एक से अनेक में विभाजित होकर  *मैं-हीन* हो जाना 

  

 सिख रही हूं

निरन्तर द्वंद और

आघातों के दर्द को सहना


 सीख रही हूँ

 जीवन में सत्य के मूलभाव को समझ, सार्थक हो जाना।

   भारती सोनी झाबुआ



15


 आ-----प आये , हुए बढ़भाग

   सुगन्धित क्यारी मधुबन है न्यारी

  दसो दिसि वारी, थिरक रही बानी।।

   आप  आये हुए बड़भाग।।।


1 सत्य सुमङ्गल गांवे

   धरम ध्वजा फहरावें

   दीप की माला सजावे--  ।

          आप आए हुए बड़भाग।।


2 ज्ञान की ज्योति बारी

   आतम अनहद बाजी

    धरा धन धन्य कहावे।

         आप आये हुए बड़भाग।।



16


 हे! स्वाभिमानी वीरांगना

 हे जगत धारिणी जननी माँ।।

 नारी हो तुम जागो जग में

 नारी हो तुम जागो पल में


तुमसे है जीवन जगत भरा

तुमसे हर मानव पला बड़ा

तुमसे ही ज्योति दिव्यमयी

तुमसे ही पावन धर्म हुआ।


रानी लक्ष्मी को याद करो

वैभव्य अहिल्या मान करो

दुर्गा की छवि धारण करके

वात्सल्य प्रेम की धार

बहो।


ये

 है वर्तमान की धारणा

एक एक है सुख की योजना

तुम शिक्षा का सम्मान करो 

अपने जीवन का मान करो

अग्रज होकर बाहुबल में

तुम देश भक्ति की आन बनो।


 संकल्प सुदृढ हो जायेगे

सबविघ्न तभी टल जायेगे

नत मस्तक सब होंजाएँगे

साहस ही गुण बना जाएंगे


 इतिहास तुम्हे ही रचना है

 वरदान तुम्ही से पलता है

नरनारी का सम्मान करो

सब साथ साथ,सब साथ चलो


 सब साथ साथ सब साथ चलो।

  (भारती सोनी झाबुआ)

  नारी सम्मान


17

सन्निकर्ष से शून्य तक


नेह, प्रेम, सामर्थ्य और असीम 

प्रांजल भावनाओं के द्वार से 

जब सत्य गुजरता है। 

तब

मौन हो जाता है, 

द्वेष, ईर्ष्या, अभीप्सा का तांडव।

कौतूहल 

अपरिचित नही तब,

जब

सृष्टि का देवता

 "मैं" से मुझे ले जा रहा होता है,

 सन्निकर्ष में शून्य तक।

 कथानक

 सत्य हो जाते है,

 जब 

 सृष्टि के नियम

 मानव साध लेने को होता है तत्पर।

न कोई बाधा,

न पिपासा

न ही  वाचालता

न ही घोष ....।

अद्भुत ,

सबकुछ अद्भुत है, 

सृष्टि दृष्टा की सूक्ष्मता का दृश्य।

 (भारती सोनी झाबुआ)



18


श्वेत वदन वो पंछी छोटे(धुप के टुकड़े)

जो तकते आँगन प्रथम प्रहर के,

अलसाई सी उषा ने बांधे

उनके कंठ में तार किरण के।

  शंख बजाते सुर झिन्गुरी

  अब भी आराधन को हे

 चहक सुरीली कोकिल कंठी

  नित नित गीत सृजन को हे(

भारती सोनी)।436

Monday, 18 September 2017

संन्यास और प्रेम

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।गीता, 5.3।। जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि हे महाबाहो द्वन्द्वों से रहित पुरुष सहज ही बन्ध से मुक्त हो जाता है।। वास्तव में, संन्यास का सही भाव है तटस्थता, निवृत्ति, निस्संगता, निर्लिप्तता। गीता में जो संन्यास संबंधी दर्शन दिया गया है, वह इन दो विपरीत धारणाओं के बीच उपयोगी सामंजस्य स्थापित करता है।  संन्यास का व्यावहारिक पक्ष यह है कि वह इष्ट से अभीष्ट, द्वन्द्व से निर्द्वन्द्व और विकल्प से निर्विकल्प का यात्री होता है। ऐसे में वह अचीवर नहीं है। अर्थात् संन्यास एक मार्ग है व्यक्ति का गुण नहीं। जैसे दो पृथक् किनारों के बीच सरिता अपने मार्ग में अपने मूल स्वभाव में निश्चल बहती है। संसार में विपरीत दिशाएँ नहीं होती तो यह संसार होता ही नहीं। हम इसमें एक समन्वय स्थापित कर के चलते हैं तो यह समन्वय योग हुआ। प्रेम योगी इस द्विविधा से अक्सर गुजरता है पर उसका प्रेम उदात्त हुआ तो अपने विस्तार से सबको आच्छादित करता है। आपकी कविता में प्रेम का विस्तार अतीत से वर्तमान तक परिलक्षित होता है। समय अौर अनुकूल परिस्थितियों में अंतरंग से बहिरंग होना कवि का स्वभाव है। आप अभिव्यक्त हुए यह प्रेम का भीतर से बाहर की ओर एक प्रवाह ही है। जो बीज हृदय में अंकुरित होते हैं काव्य उन्हीं का प्रस्फुटन है। शायद यही कारण है कि संन्यास अौर प्रेम के बीच दुविधा का स्थान नहीं है। प्रेम या संन्यास अथवा संन्यास या प्रेम वैकल्पिक अवधारणा के मार्ग नहीं है अपितु वे परस्पर संपूरक हैं। प्रेम करो तो विशुद्ध हो, अलिप्त हो, निराकांक्षी हो। बंधन से मुक्त हो कर प्रेम करोगे तो प्रेम अपने आप उदात्त हो जावेगा। उसके विस्तार की चिन्ता आप को नहीं करनी है। आप इसे प्रेम की कोई नई परिभाषा मत समझ लेना। यह प्रेम का अपना ही गुण है। जहाँ प्रकाश है वहाँ से अंधकार स्वयं विदा हो जाता है उसी तरह जहाँ प्रेम है वहाँ विद्वेष का कोई स्थान नहीं। न्यास का अर्थ है ट्रष्ट, विश्वास। विश्वास के बिना न तो संन्यास है और न ही प्रेम। जगत में लोगों ने इस असीम प्रेम को प्रकारों में विभक्त कर दिया। बड़ा अजीब लगता है जब कोई कहता है यहाँ प्रेम करो वहाँ न करो। इससे करो तो उससे न करो। जिसके हृदय में प्रेम के बीज पड़े हैं वहाँ उसका प्रस्फुटन तय है। लेकिन जब किसी पात्र तक पहुँच जाए तो फिर कोई विक्षेप न हो। ऐसा प्रेम अजस्र स्रोत हो। अंग्रेजी में इसे कहते हैं 'पेरेनियल'। धार चाहे पतली हो पर निरन्तर हो। चाहे गंगा यमुना की तरह दृष्ट हो सरस्वती की तरह अद्दष्ट। पर हो निरन्तर । ....

Sunday, 17 September 2017

और क्या कहें

ना शब्द है न राग है हम और क्या कहे
बुझता हुआ चिराग है हम और क्या कहे ।।

ता उम्र बांटते ही रहे रौशनी को हम
फिर भी तो हम में दाग है हम और क्या कहे ।।

सातो समुद्र पी गया मै फिर भी जल रहा
मन में ही कितनी आग है
हम और क्या कहे

खुशबू नही है फूल में सब बाग़ बिक गए
गिरवी ये कण पराग है हम और क्या कहे ।।

जब सूर्य से गिरी तब तो एक रूप  थी
धरती ये भाग भाग है हम और क्या कहे ।।

जबसे चलन मे आदमी डंसने यह लगा
हैरान काले नाग है हम और क्या कहे ।।

पकवान से सजी हुई महलो की थालियां
मेहनत की रोटी साग है
हम और क्या कहे  ।।

कहने को लाल रंग है लकीर में सजा
यह मांग में सुहाग है हम और क्या कहे  ।।

और क्या कहें

ना शब्द है न राग है हम और क्या कहे
बुझता हुआ चिराग है हम और क्या कहे ।।

ता उम्र बांटते ही रहे रौशनी को हम
फिर भी तो हम में दाग है हम और क्या कहे ।।

सातो समुद्र पी गया मै फिर भी जल रहा
मन में ही कितनी आग है
हम और क्या कहे

खुशबू नही है फूल में सब बाग़ बिक गए
गिरवी ये कण पराग है हम और क्या कहे ।।

जब सूर्य से गिरी तब तो एक रूप  थी
धरती ये भाग भाग है हम और क्या कहे ।।

जबसे चलन मे आदमी डंसने यह लगा
हैरान काले नाग है हम और क्या कहे ।।

पकवान से सजी हुई महलो की थालियां
मेहनत की रोटी साग है
हम और क्या कहे  ।।

कहने को लाल रंग है लकीर में सजा
यह मांग में सुहाग है हम और क्या कहे  ।।

Wednesday, 21 June 2017

निवेदिता मुकुल सक्सेना

विद्यर्थियों को समर्पित पल

एक एक लम्हा,,,,
गुजरता जा रहा,,,,

कीमती सा समय,,,
अपनी पहचान बता रहा,,,

जी लो हर पल,,,,
अब लौट कर न आएगा,,,,

अमूल्य बना दो इसे,,,,,,
ज़िन्दगी सवार जाएगा,,,

प्यारे हो तुम बहुत,,,,
समझ लो ये बात,,,

सुनहरे पलो में छुपा,,,
ये हीरा निकाल लो,,,,

ये पल लौट कर ना आएगा,,
बस याद छोड़ जाएगा,,,।

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

नज़रिया

करती हूं तुम पर भरोसा,
तुम्हारे वादों इरादों पर ।

,जो कहते हो सुन लेती हूं
जो दिखाते देख लेती हूं ।

क्योंकि ये शहर तुम्ही से है,
ये मान लेती हूं,,।

राष्ट्रवादी समझ कर ,तुम
पर विश्वास करती हूं।

क्योंकि तुम जनता के लिए,
खड़े हो , ये सियासि बाते।

ये राजनीति की बाते,
ये सब नही मेरे हिस्से ।

बस अब तुम पर भरोसा है,
ये में जानती हूं ।।।

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

मंदिर यहाँ

सुना है गाँव मे सब
ऋतुयें नज़र आती है
कभी जेठ की तपती धूप
कभी सावन की रिमझिम
कभी बंसन्त की फुलवारी
कभी हेमन्त की हवा

सब सपना से हुआ जब
देखा संघर्ष भी यहां
फिर जीवन की आपा धापी
में आया एक रंग नया
जो बचा उसे समेट लो यादों में
क्योंकि ये भी कीमती पल है यहां,

बोनसाई सी दुनियां
बस एक वार्तालाप यहां
ब्रज यहां, मथुरा यहां
है घर एक मंदिर यहां
फिर क्यों दोडू यहा वहां
जब सब कुछ है यहां

मंदिर यहाँ, मंदिर यहाँ

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

एक प्यारी सी मोरनी आयी
थी बड़ी घबराई ,सकुचाई
कहा आ गयी, कहा जाउ
खो गयी घर की तलाश में
घर मेरा तो टूट गया ,बिखर गया।
हरियाली था साथी मेरा बिछड़ गया
क्या कहु अपनी विरह कथा ।
दूर दूर तक ,अब उम्मीद नही
कंकरीट के जंगल मे मेरा ,
घर डूब गया, अब आदत नही
किराए से रहने की जाउ तो कहा जाउ।
जंगल सा साथी मेरा छूट गया
देख घबरा रही लोगो को ।
देखो एक दरख्वास्त है मेरी,
हाथ जोड़कर विनती मेरी
जंगल को जंगल रहने दो।
मेरा घर मुझसे मत छीनो,
एक प्यारी सी मोरनी आयी।
निवेदिता मुकुल सक्सेना

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

सबका सफ़र एक हैं लेकिन अलग अलग रफ्तार है,
और एक दिन सबको थककर सोना पाव पसार है।

अपनी अपनी तिर कमाने, अपना सर संधान हैं,
किंतु लक्ष्य घोषित करता है, किसका कहा निशान है।

मत्सय भेद जो करें उसी की होती जय जयकार है,
और एक दिन सबको थककर सोना पाव पसार है।

जिसकी जितनी भारी गठरी उतना अधिक दबाव है,
जिसकी जितनी लंबी चादर, उतना ही फैलाव है।

अपनी अपनी बांध गठरिया, जाना सबको पार है,
और एक दिन सबको थककर सोना पाव पसार है।

पीछे बंधे हाथ, अौर शर्त है सफर किससे कहे कि,
पाव का काटा निकाल दे, गुज़र रहा संघर्ष शोर गुल।

चहल पहल में जीवन है नही सिर्फ जीने का भरम है।
अौर एक दिन सबको थककर सोना पाव पसार है।

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

श्री मान जी पर वारी जाउ
बोले आउ दो मिनिट में।
बैठी बैठी पगला जाउ
इंतेजार पर आता गुस्सा ।
फिर सोचु क्या होगा इससे
फिर लगा निकाल तो लू ।
में अपनी भड़ास दिन हो या रात
आ गए अब श्रीमान जी।
मेरे नियंत्रण की सीमापार
शक्ल देखी उनकी सोचा।
फिर सोचा रहने दो यार
निकलना नही कुछ समाधान।
ये तो एक बीमारी है
आता हूं दो मिनिट में आनी है।