Monday, 18 September 2017

संन्यास और प्रेम

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।गीता, 5.3।। जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि हे महाबाहो द्वन्द्वों से रहित पुरुष सहज ही बन्ध से मुक्त हो जाता है।। वास्तव में, संन्यास का सही भाव है तटस्थता, निवृत्ति, निस्संगता, निर्लिप्तता। गीता में जो संन्यास संबंधी दर्शन दिया गया है, वह इन दो विपरीत धारणाओं के बीच उपयोगी सामंजस्य स्थापित करता है।  संन्यास का व्यावहारिक पक्ष यह है कि वह इष्ट से अभीष्ट, द्वन्द्व से निर्द्वन्द्व और विकल्प से निर्विकल्प का यात्री होता है। ऐसे में वह अचीवर नहीं है। अर्थात् संन्यास एक मार्ग है व्यक्ति का गुण नहीं। जैसे दो पृथक् किनारों के बीच सरिता अपने मार्ग में अपने मूल स्वभाव में निश्चल बहती है। संसार में विपरीत दिशाएँ नहीं होती तो यह संसार होता ही नहीं। हम इसमें एक समन्वय स्थापित कर के चलते हैं तो यह समन्वय योग हुआ। प्रेम योगी इस द्विविधा से अक्सर गुजरता है पर उसका प्रेम उदात्त हुआ तो अपने विस्तार से सबको आच्छादित करता है। आपकी कविता में प्रेम का विस्तार अतीत से वर्तमान तक परिलक्षित होता है। समय अौर अनुकूल परिस्थितियों में अंतरंग से बहिरंग होना कवि का स्वभाव है। आप अभिव्यक्त हुए यह प्रेम का भीतर से बाहर की ओर एक प्रवाह ही है। जो बीज हृदय में अंकुरित होते हैं काव्य उन्हीं का प्रस्फुटन है। शायद यही कारण है कि संन्यास अौर प्रेम के बीच दुविधा का स्थान नहीं है। प्रेम या संन्यास अथवा संन्यास या प्रेम वैकल्पिक अवधारणा के मार्ग नहीं है अपितु वे परस्पर संपूरक हैं। प्रेम करो तो विशुद्ध हो, अलिप्त हो, निराकांक्षी हो। बंधन से मुक्त हो कर प्रेम करोगे तो प्रेम अपने आप उदात्त हो जावेगा। उसके विस्तार की चिन्ता आप को नहीं करनी है। आप इसे प्रेम की कोई नई परिभाषा मत समझ लेना। यह प्रेम का अपना ही गुण है। जहाँ प्रकाश है वहाँ से अंधकार स्वयं विदा हो जाता है उसी तरह जहाँ प्रेम है वहाँ विद्वेष का कोई स्थान नहीं। न्यास का अर्थ है ट्रष्ट, विश्वास। विश्वास के बिना न तो संन्यास है और न ही प्रेम। जगत में लोगों ने इस असीम प्रेम को प्रकारों में विभक्त कर दिया। बड़ा अजीब लगता है जब कोई कहता है यहाँ प्रेम करो वहाँ न करो। इससे करो तो उससे न करो। जिसके हृदय में प्रेम के बीज पड़े हैं वहाँ उसका प्रस्फुटन तय है। लेकिन जब किसी पात्र तक पहुँच जाए तो फिर कोई विक्षेप न हो। ऐसा प्रेम अजस्र स्रोत हो। अंग्रेजी में इसे कहते हैं 'पेरेनियल'। धार चाहे पतली हो पर निरन्तर हो। चाहे गंगा यमुना की तरह दृष्ट हो सरस्वती की तरह अद्दष्ट। पर हो निरन्तर । ....

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