Sunday, 17 September 2017

और क्या कहें

ना शब्द है न राग है हम और क्या कहे
बुझता हुआ चिराग है हम और क्या कहे ।।

ता उम्र बांटते ही रहे रौशनी को हम
फिर भी तो हम में दाग है हम और क्या कहे ।।

सातो समुद्र पी गया मै फिर भी जल रहा
मन में ही कितनी आग है
हम और क्या कहे

खुशबू नही है फूल में सब बाग़ बिक गए
गिरवी ये कण पराग है हम और क्या कहे ।।

जब सूर्य से गिरी तब तो एक रूप  थी
धरती ये भाग भाग है हम और क्या कहे ।।

जबसे चलन मे आदमी डंसने यह लगा
हैरान काले नाग है हम और क्या कहे ।।

पकवान से सजी हुई महलो की थालियां
मेहनत की रोटी साग है
हम और क्या कहे  ।।

कहने को लाल रंग है लकीर में सजा
यह मांग में सुहाग है हम और क्या कहे  ।।

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