Friday, 28 April 2017

ज्योति सोनी


🌺मौसम ने ली अंगड़ाई🌺

मौसम ने ली अंगड़ाई
देखो कैसी गर्मी छाई
इस नौतपा मै यौवन छाया
देखो कैसी कुदरत की माया
धरती तपी तपा आसमान
जानवर तपा तपा इन्सान
पशु-पक्षी खग वृंद तपा है
देखो ये सारा जहाँ तपा है
ये ढूंढ रहे है तरूवर की छाया
कहा से लाऊ तरूवर की छाया
धरती करे पुकार
जागो मेरे लाल
ओढ़ा दो मुझे
हरियाली की चादर
जन-जन की है
यही पुकार
वृक्ष लगाओ अपार

✍ज्योति सोनी✍

2

✍पूनम की रात✍

आई पूनम की वो रात
सजी है तारो की बारात
लग रही है दुल्हन की तरह
चाँद ने अपनी चांदनी बिखेरी
हरियाली की चादर ओढ़े
सजी है फूलो की सेज
घनघोर काली घटा छाई
रिमझिम बरस रहा है मेघ
मौसम हो रहा है मदमस्त
आई पूनम की वो रात



शकुन्तला सोनी

👍एक नज़्म ताजा-ताजा👍

🍫"सिरहाने से"🍢

तकिया सिरहाने का
सुनता भी है, कुछ कहता भी है

जो पी चुका है
अनगिनत खारे आँसू
गवाह है मेरे उन
जागते हुए देखे सपनों का
सोते हुए जागे सपनों का
छत को अपलक निहारती
पथराई, अलसती आँखों का
याद आती है मुझे कभी
सिरहाना बनी बाहों की
तकिया, धुले हुए काजल को
सहेजा जिसने बड़े जतन से।
      तकिया सिरहाने का
      सुनता भी है, कुछ कहता भी है।।

थपकी देती हूँ इसे
जैसे यह तुम हो
छुअन देती हूँ इसे
जैसे यह तुम ही हो
प्यार का मीठा पैगाम
जैसे तुम तक पहुँचेगा ही
इसके कानों में फुस फुसा कर
कह जाती हूँ कुछ
जैसे सुन लोगे अभी तुम
फिर कहता है हौले से
बाहें वे लौटेंगी जैसे ही
दूर कहीं चला जाऊँगा।
      तकिया सिरहाने का
      सुनता भी है, कुछ कहता भी है।।

            भावभूमि----
            श्रीमति शकुन्तला सोनी की

            (शब्द --- रामनारायण सोनी)

भारती सोनी

जीर्ण जब करती हृदय की
उलझती चिंतन विथायें,
तब कभी मिथ्या से सच का
साथ दे दूं तो निभेगा?
सुलगती चिंगाररियो से
रतविमुख न हो सके तो,
तब शिथिल नभ नीर से
घिर कर बिखर लू तो बुझेगा?

निरन्तर
😊🙏..... 731

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

अब उषा के गहन मंथन
साँझ के अन्तः  बसे है
संधियों से  प्रखर जैसे
कहे से अनकह रहे है।
   तरुण दिन की थाह कोई
    क्यो भला यूं छल रहे है
    माँजते इस समय को
    विच्छिन्न मन भी पल रहे है 721

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

दृग अनिर्वचनीय से
कैसे तुमने  बांधे प्रियतम,
आँचल के कोरो से
ढकता आनन चंचल
समाधियों की शिला बनी
निश्चल सा अभिनव।
मौन कहाँ तुम  आखर का
हो चिर स्पंदन721

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

मैं परिधि तुम हो अनन्त
मैं सांझ रही तुम प्रथम किरण
मैं मौन भले तुम प्रखर प्रखर
मैं सजल सजल तुम हो मरुथल
जब जतन हुआ  ताना बाना
तुमसे मैं का आना जाना
तुम निर्मोही,मैं रत माया
तुम पल मेरे,
तुम बल मेरे
तुम मन मेरे मैं हूँ काया..722

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯

अनन्त अथाह रही सीमा जो
प्रतिपल निसदिन  स्वयं जी गई।
प्रश्नों के अंबार भले
प्रतिउत्तर  वो आजन्म पी गई।
निश्छल थी नदियों के वेग सी
सहज ही कलकल स्वयं रीत गई।
स्वयं प्रभा के संदेशों सी
अनुच्छेद में  वर्ण  भी  रही।
                ।। 719 ।।

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🎄🕯🎄

""भगौरिया स्वागत "

धुन सुन बांस  की बंसुरिया  भी
गुन धुन राग सुनाने लगी,
रंगों की हे विविध छटा जो
परिधानों  संग आज सजी,
फुलकारी के नित नित छापे
हाथ पाँव श्रंगार हुए,
गालो की लाली भी सजती
होठों का आधार लिए।
ढोल और मांदल की थापे
उल्लसित कर जाय रही,
थिरकन ताड़ी की मदिरा मय
मन आँगन बहकाय रही।
हुंकारी, कुर्राट भरे
गूंजे मदहोशी  हाला में,
धम धम पढ़ते पाँव थाप पर
विजय  प्रेम की  धारा में।
कामायनी रूप की दासी
हर बाला श्रंगारीत है,
मदन बना हर नर  मोहित है
ये उत्सव आभारित है।
भगौरिया की परम्परा ये 
प्रेम स्नेह सम्मान यहाँ
जिसने पाया गर्व हुआ है
ईश्वर का वरदान यहाँ।।

               भारती सोनी

               पदांश  (।। 721।।16/03/16)

प्रार्थनाएं प्रिय होगी- -

स्मृतियों की अनदेखी,
विश्वस्त  क्या भविष्य ,
कैसे कोई मंथन होगा?
विमुख  विस्तृत  शोध,... उफ़
अंतह से कोई प्रश्न होगा ?
ले चलो स्वप्नों  के रथ जो
थाह पाकर  पथ भृमित न हो सके
आश्वस्त होकर साथ से
अंशों से जुड़कर फल सकें।
अब दिशाएं  स्थिर होगी,
राह  भी निर्भीक  होगी
प्रार्थनाएं प्रिय होंगी....
अब तुम्हारी सहजतायें
मेरे पथ की नींव होगी...
प्रार्थनाएं प्रिय होगी...।।।।

          बस अभी..😊🙏
                भारती सोनी

🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄

मैंने  कदर्थ यू बीज नही
बोए, कतिपय विध्वंस के,
कर्हो कहाँ से लहर उठी ये
चिंगारी  -मन्तव्य से?
नही कोई विन्यास रहा
सुविचार प्रीत से पाले थे।,
किसके  आहत हुए स्वप्न
किसकी मुस्कान पे धावे थे।
मुझमें मेरे  कष्ट भाव ,
दक्षिणा मात्र से पाले थे,
अब कोई कितने समदर्शी
कोई  ना सह धारे थे।

भारती सोनी

817🙏

,🕯🕯🕯🕯🕯🕯

चलो की उगलने दो
तिश्न ,तीव्र,तपन की धारा।
आश्रय पराजित नही
मोक्ष अविश्वसनीय नही।
सम्भव है यही प्रकृति प्रसाद है,
मेघो के बरसने से पहले भी इतिहास है।.....

816🙏

फूल सब मुरझा गये  चाहे रजनी भर,
प्रात निश्चित आँगनों में  सम ही होगी।  रीस आँखे  अंजनी  हो आज चाहे
इस धरा पर अश्रु के संग वो सनेगी,
हे प्रथम मन
वो तुम्हारा सच कहेंगी,
व्यथा क्यों कर वो सहेगी।..

.निरन्तर🙏

समय के गति रेख से
जब बढ चले तो चल ही दो मन।
कब तलक परछाइयों में
ज्वलित बाती दमन लेगी ,
धुंध जब उभरेगी ,भानु
समाधानी साथ होगा।
मृग मरीचिका की भांति
हर पहर संसार होगा।
प्रश्न तुल्य ये हिम शिखाएं
उस तपिश के भय करेंगी
जब तुम्हारे धैर्य पग से
ये धरा श्रृंगार लेगी।
ये धरा श्रृंगार लेगी।।796।।

🎄🎄🎄🎄🎄🎄

वो जाग रहा  है अनवरत,
नैपथ्य को धकेलता हुआ
मौन सा है, मगर चिंतन शील।
अतिरिक्त  जय सा है वह,
शून्य आकाश की तरह।
बाधाएं जिसे नहीं जीत पाई,
अनन्त अनन्त अनन्त ओजस से पूर्ण
चेतन और अंतः को नापता वह।
चैतन्य ..
वो जाग रहा है अनवरत..।

*आपको समर्पित "अभी से अभी तक"
        (भारती सोनी 795)

,🎄🎄🎄🎄🎄🎄

            
[21/01, 09:53] Bharati Soni:
हार चाहे जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं.।

          भारती सोनी

[21/01, 11:40]
हार बिना जीत किसे मिली है
जीत तो हार के बिछौने पर पली है।
भय कभी असीम नहीं होता
परिधियों के पार ही जीत मिली है।।

                      रामनारायण सोनी

विकास

🌹🌹🌹🌹)

जय जी की कविता के विस्तार में---

गा रही ये रागिनी
प्रीत का ये बन्ध है
बह रहा मल्हार है
सावनो की धार है।

धधक धधक ये आग है
पर्वतो के वक्ष पर
शिल्प का प्रहार है
मौन का ये नाद है
शोर का सम्वाद है

घुमड़ रही घटा सी ये
सावन का आगाज है
प्रीत है ये अनमनी
धड़कनो का साज है

टूट रहे तट बन्ध है
विद्रोह की आवाज है
उन्माद की ये रागिनी
विजय का उल्लास है

चमक रही ये बिजलियां
आने को हैं आंधीयाँ
सत्य का सैलाब है
क्रांति का ये नाद है

            विकास

जया पाठक


[09/05, 1:50 a.m.]

जिंदगी
वह भूख खाती है
प्यास पीती है
वह मौत जीती है
अपने घाव खुद सीती है ।

[09/05, 1:50 a.m.]
हम कहते हैं
बदल देगें इतिहास
वह हँस रहा है
एक कँटीली हँसी
कटाक्ष कर
कह रहा है
खुद को बदले बिना
कैसे बदलेगा इतिहास ?
बगैर फेसबुक
बगैर वाट्स एप में दर्शाये गये
नहीं होती साधना पूरी
ढिंढोरे पीट कर
इतिहास बदलना
कोई सीखे हम से

[09/05, 1:51 a.m.]

समय एक तुनक मिजाज
इंसान है ।
जो मजाक कर तो लेता है किन्तु
सहता नहीं ।

[09/05, 1:51 a.m.]
वह बर्फ है
तुम आग बन जाओ
वह पानी है
तुम पत्थर बन जाओ
वह पत्थर है
तो भला उसी में है
कि तुम नदी बनकर बह जाओ ।

[09/05, 2:28 a.m.]

रजनीगंधा यह देख कर 
हुई शर्म से लाल
भीड उन्ही के साथ थी
जिनके हाथ मशाल ।
जिनके हाथ मशाल
न पूछो बात उन्ही की
लाइक शेअर में दुबकी प्रतिभा
तिकडम ही टेलेन्ट जिन्ही की ।
दिन को कर दे रात
निशीचर बन जाये फंदा
क्यूं न हो फिर लाल
उजियारी निशिगंधा ।

🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄

[28/04, 16:14]

बेटियाँ खेलते खेलते बडी हो जाती है ,
पता ही नहीं चलता कि
कब खेल खत्म हो जाता है
और भाग्य का खेल शुरु हो जाता है ।

जया पाठक

👧👧👧

नन्ही मुस्कान--

किसी नन्हे बच्चे की मुस्कान
देख कर कवि ने क्या खूब लिखा है...

"दौड़ने दो खुले मैदानों में ,
इन नन्हें कदमों को साहब .!

जिंदगी बहुत तेज भगाती है ,
बचपन गुजर जाने के बाद .!!

माधुरी सोनी

सींचते सींचते

अनगिनत फूल खिले आज सुंदर बगिया में
बहारों के मौसम में
वीराना तुम कर गए
सींचते सींचते
व्यथित मन में चिता जल रही
जिसे कह रहे ,सब देखो होली
आँखें लाल स्याह हो रही ,
बह गए आँसू बनकर ,
लहू की रोली
रिसते रिसते

आगे आगे में चल पड़ा ,
पीछे तुम्हारी अर्थी
वो रंग भरे दिवस
और रँगीली तेरी प्रीति
बदरंग हो गया ,
व्यथित मन
पसीजते पसीजते ...

रो देता हूँ अक्सर ,
जब अक्स तेरा दीखता है
दर्द भरे चेहरे में ,
खामोश वक्त
जब छुपता नहीं है
बदल गया सब कुछ ,
जीवन की डस सुन्दर सी बगीया में
वक्त भी , तू भी, शायद  मैं भी
बदलते बदलते ......

माधुरी सोनी

Thursday, 27 April 2017

रामनारायण सोनी

"माँ मेरा अभिनन्दन तू"

जीवन का पहला छोर तू ही
जीवन की पहली भोर तू ही
संसृति की सृजन विधाता तू
शीतल करुणा की छाया तू
            मेरी अर्चन - पूजन तू।
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

प्रेम पला था तेरे उर में
तब जब मैं जन्मा ही न था
स्वप्न बुने थे तूने तब ही
तब जब मैं अपना ही न था
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

मैं गूँगा था, बोल नहीं थे
रिश्तों का कोई बोध नहीं था
जग का पूरा शब्द कोष ही
प्रथम तुझी ने दिया मुझे था।।
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

अस्थि चर्म और सारे वय में
तू ही अविरल यूँ बहती है
जैसे नभ के कण-कण में
रंजित पावन पवन रची है।
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

मेरा अस्तित्व बनाने के हित
किये आचमन पीड़ा के पल
कैसे मोल चुकाऊँ इसका
नत होता है मस्तक पल-पल
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

छूट गई तू बचपन में ही
मै छुप छुप अश्रु बहाता हूँ
हर माँ की सूरत में तब से
मैं तुझे ढूँढता ही रहता हूँ
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

💧प्रीत के पाहुन🍂

क्यों हुए आतुर हमारी
नापने गहराई मन की
क्यों छुआ है घाव मेरा
जागती है पीर तन की।
चाँदनी भी चुभ रही है
जो जगाती याद उनकी
कोई चुनरी तान दे अब
तारकों की और तम की।।

सूझता ना पथ कोई भी
गर्दिशों की धुन्ध इसमें
फूल हैं न पात है अब
इस चमन की अंजुमन में।
ये कदम भी आज अँकड़े
वे नहीं हैं  जब सफर में
डूबता अभिसार गहरी
क्षोभ की नीरव निशा में।।

दीप की लौ सी किरण भर
रोशनी गलती रही
झर झराते अश्रु कण ले
प्यास ही जगती रही।
आस के नभ में विचरते
स्वाँस के पंछी रुपहले
प्रीत के पाहुन पधारो
प्राण के जाने से पहले।।

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

अपूर्ण-पूर्ण

स्वप्न से शब्द तक
शब्द से अर्थ तक,
फर्श से अर्श तक
अपूर्ण-पूर्ण तुम हुई।

चलो दिगंत घूम लें
प्रखर प्रभात चूम लें,
विराट विश्व की प्रभा
धरा हुई कनक मई।।

चुकी विभावरी तमी
भरा है घट अमी-अमी
प्रपात झर-झरा रहे
हुए वितान चम्पई।।

रोलियाँ बरस रही
भिंगो रही हृदय-जमीं
न मैं रहा अपूर्ण और
अपूर्ण-पूर्ण तुम हुई।।

निवेदक
रामनारायण सोनी

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

  
😔 कातर क्रन्दन 👩‍🔬

बहुत लिखा है अब तक हमने
अट्टहास करते दानव को
आग उगलती बन्दूकों और
दो दो मुँह वाले मानव को

मूक हृदय के स्पन्दन को
कान लगा कर सुनना होगा
जिसमें रुदन भरें है अगणित
उन पर मरहम भरना होगा

जहँ स्वप्न अधूरे टूटे हों और
अधर धरे हों प्यास निठुर
जहँ यौवन रीता बीत गया
बन गया जहाँ मधुमास विधुर

जीवन जो जीवित लील रही
संघर्षों की विप्लव धाराएँ
द्वन्दों से जूझ रही हों जहँ
अवशोषित होती बालाएँ

लिखना शेष अभी है हमको
लोचन में प्लावित अश्कों को
करुणा के कातर क्रन्दन और
विगलित तन बुझती पलकों को

रामनारायण सोनी

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

मैं और तुम

प्रश्न हलाहल का ही नही था
मैं तो हँस कर उसको पी गई।
पर तुमको अचरज होता है
क्यों मैं फिर भी जी गई।।

पर उस नीली छत वाले में
मेरा भी विश्वास अटल है।
फिर हर प्याला ही प्रसाद है
अमिय भरा है या कि गरल है।।

तुमने कालकूट को पूजा
मैं तो प्रभु की चरण शरण हूँ।
तुमने गरल बीज बोए हैं
मैं उस प्रभु की प्रीति-वरण हूँ।।

रामनारायण सोनी

नज़्म

डायरी के पृष्ठ बोलते हैं--

पुरानी सी मेरी डायरी के
जर्द पड़ गए पृष्ठों में
पृष्ठों में सियाही जो है
मेरी कलम की ही है, पर
हर शब्द में रूह तुम्हारी ही
सौंधी सी महकती है सुगन्ध बन कर
उन अक्षरों में तुम्हारे तन बदन की

कैसे अजीब संगतराश हैं ये शब्द
मिल कर तुम्हारी सूरत बना देते हैं
एक अक्षर पर चढ़ी बिंदी
उतरी थीं तुम्हारे ही माथे से

और कहीं
सपनीले गुलाबी एक पृष्ठ पर
यादों की लेई से चिपके अक्षर
गूँजते रहते हैं अक्सर
रूह की आवाज बन कर
उस खास कमरे में दिल के
नहीं आता जाता जहाँ कोई और
सुनता हूँ इनको मैं जी भर भर कर

"चुपके चुपके कुछ कहते हैं
आसमान के झिलमिल तारे
भाव भरे है ऐसे ही
देखाे ये शब्द हमारे"

और इसमें कहीं
छुपाया था ताजा ताजा
गुलाबी गुलाब का वह फूल
झड़ गया था कहीं सूख कर
वक्त की डाल से टूटे लम्हे की तरह
पन्ने पर छूटे हुए निशान में
एक चेहरा झाँकता है कनखियों से
कहता मुझे अजनबी की तरह
पूछता है, कौन हो तुम?
और मैं कह उठता हूँ

जिन्दगी की  मेरी डायरी
उत्तर देतीं ढेर सारे प्रश्नों के
यहाँ कोई और नहीं,
तुम ही तुम हो,
हाँ केवल तुम ही हो।।

इसमें मौजूद है फिंगर प्रिन्ट
टेसू के चटकीले रंग भरे
फेंके जो पीले, गुलाबी रंग तुमने
अकसर पृष्ठ पर से निकल कर
घुस जाते हैं जेहन में
कर जाते तर बतर तन मन

उदास होता मैं जब कभी
दौड़ता हूँ इन पृष्ठों में इधर से उधर
निकलता हूँ ताजा दम हो कर
जिन्दगी की डायरी है गवाह,
जो जानती है , केवल तुमको
यहाँ कोई और नहीं,
केवल तुम ही तुम हो।।

पुरानी सी मेरी डायरी के
जर्द पड़ गए पृष्ठों में
पृष्ठों में सियाही जो है
मेरी कलम की ही है

मेरी दौलत है, सनद ही है
देख लो! इसमें मैं भी नहीं हूँ
हाँ, यहाँ कोई और नहीं,
केवल तुम ही तुम हो।।

रामनारायण सोनी

2
तुम कितने निष्ठुर हो।

कितने काँटों की फाँस चुभी बैठी पग में
कितने धूल भरे है इस मैले से दामन में
मेरे जीवन की झगुली में पैबन्द सिले कितने
मुझे देख क्यों फेर लिये ये दृग मुझसे तुमने
                सचमुच तुम कितने निष्ठुर हो।
         
               रामनारायण सोनी

सरफ़राज़"भारतीय"

*** गज़ल ***

लफ्ज़ बन कर जुबान पर आता
तीर ही था तो कमान पर आता
चाँद बनकर भी वो दूर-दूर रहा
थोड़ा नीचे तो मचान पर आता
यूँ तसव्वुर में तो सदा ही था
हो कर सच वो बयान पर आता
खुश्बुओं की तरह जो उड़ता था
फूल बनकर वो  दान पर आता
रुठ जाता वो लाख हमसे पर
मान कर भी तो  मान पर आता

🙏�🌷 सरफ़राज़"भारतीय"🌷

"दर्द का रिश्ता "- बी.डी. गुहा

" दर्द का रिश्ता "
दर्द  का रिश्ता.....
    रिश्तों का दर्द......
दर्द हो हमदर्द....
    दर्द तो दर्द ....
बेदर्द !क्या जाने ! दर्द......
दर्द ! कभी अकेला नहीं होता
क्षत-विक्षत-अहत
भाव-भावनाओं का सैलाब
ही होता है .......
सहानुभूति.......!
चंद अल्फाजों की .....
क्या ! अनुभूति..........
दर्द या दर्दीली.....
दर्द अपनों ने दिया या परायो
ने .........
फिर भी "दर्द" को अपना ही
कहना पड़ता है ........
दर्द तो दर्द है रिश्तों का दर्द
या हम दर्द......
कौन!मौन का दर्द....
या दर्द का मौन.....
जाने कौन......
दर्द अपना न रिश्ता फिर भी
सहना पड़ता है .....
"दर्द का रिश्ता ".....

बी.डी.गुहा रायपुर
छत्तीसगढ़✍🙏

मधु जी

🙏🏼Gangur Special🙏🏼
😊🌹These Lines Dedicated  to All Ladies🌹😊

नारी और पेड़, अबूझ रिश्ता है

नारी और वृक्ष मुझे एक से लगते हैं
खुश हों तो दोनों फूलों से सजते हैं
दोनों ही बढ़ते और छंटते हैं
इनकी छांव में कितने लोग पलते हैं।

देना देना ही इनकी नियति है
औरों की झोली भरना दोनों की प्रकृति है
धूप और वर्षा सहने की पेड़ की शक्ति है
दुःख पाकर भी सह लेना नारी ही कर सकती है।

नारी और पेड़ में एक अबूझ रिश्ता है
जो दोस्ती से मिलता जुलता है
पेड़ चाहता है कुछ पानी कुछ खाद
नारी चाहती है सिर्फ प्यार और सम्मान।। 😊🌹💐

🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄

काचर ,चवली रे साग साथे बड़ी लज्जतदार है,
ताजों माखन ,फली नेजिया ,'खीच' री मनवार है ।
ठण्डी मीठी ईमलाणी में इलायची ख़ुशबू दार है ,
घी में चुपड्या दुपड़ा फल्क़ा गरमा गरम तैयार है,
घणा उडीक पीछे आयो आखातीज रो त्योहार है ।

आखबीज २८ /४/१७
आख़ातीज २९/४/१७

जीवन के रंग कई - आर.डी. वैरागी

जीवन में कई,
रंग भरे हैं,
चाहत के रंग से,
कब उभरे हैं,
दिल की चाहतों ने,
कभी घाव दिये हैं,
कभी घाव भरे हैं,
जीवन में कई,
रंग भरे हैं,
चाहत के ये कितने,
नज़ाकत रिश्ते
चाहत के ये कितने,
शरारत रिश्ते,
कितने उथले,
कितने गहरे हैं,
जीवन में कई,
रंग भरे हैं,
सागर हैं, कितना गहरा
उस पर हैं, लहरों का पहरा
दरियाओं का किनारा,
उसका हैं, सहारा
सागर ने भी,
कितने जख्म सहे हैं,
जो साहिल से कहे हैं,
जीवन में कई,
रंग भरे हैं

आर.डी.वैरागी।   *स्वरचित*
🍀🌺💕❤💕☘💐🌾👏🙏🏽📝✍🏽

दर्द का रिश्ता भी,दिल में हैं पलता
कभी दुख देता, तो कभी छलता
दर्द की गहराईयां कितनी होती हैं
गहरी, सागर की गहराईयों से भी
अधिक होती हैं. गहरी
जो नापने से नहीं नपता
दर्द तो दर्द हैं, जो हम दर्द नहीं बनता
🙏🏽📝✍🏽आर.डी.वैरागी**UR***


यह अरुणोदय है- डॉ जय वैरागी

कौन हूँ मैं !! ै
जो कभी
प्राची की स्वर्णमय मुस्कान में
उद्दीप्तनओ को चीर
झांक लेता  हूँ
गहन तिमिर की अँधेरी
वृत्त परिधियों से किनारा कर
और तुम्हारे निमित्त
यह अरुणोदय  है
-सुर्ख /लाल /रक्तिम

पर कभी जान पाये
अरुणोदय
कितना विषपान करता है
तुम्हारी लालिमा के लिए ।।

कभी सोचता हूँ
कौन हूँ मै !
दोपहर का सूर्य
जो निखिल सृष्टि की 
समस्त नमी को शोषित  कर
स्वयं के साथ
जाज्वल्यमान रखता हूँ
वीतरागी वैराग्य
ताकि भस्म हो सके
विषाक्तता  ओषधी से ।

निस्पृह गुंजित वातायन में ढलते हुए नीड़ सा
मै ही तो
गुनगुनाता हूँ
विहग के सुर स्वरों  में क्षितज़ की मेड पर
हाथों  में  मेहँदी की लाली लिए 
लजीली दुल्हन  बन

मै ही हूँ जो
नीरव निसब्द रात्रि में
निहन्ता निशांत व्योम में
निकल आता हूँ
असंख्य तारों सा
जीवन के विविध् रूपों सा
4/4/17

आर.डी. वैरागी

***बरसना बाकी हैं***
^^^--^^^--^^^--^^^--^^
हवा तो चल रही थी
उसका रुख बदलना
बाकी था
चमन में तो फूल
खिले थे
लेकिन उसका महकना
बाकी था
चमन की फिज़ाएं भी
कह रही थी
अभी उसकी
बहार का बहना
बाकी था
यौवन तो भरपूर था
लेकिन अभी
उसका छलकना
बाकी था
महकने,बहकने,खिलने
को वोआतुर हैं
बस सही वक्त और
मौसम का इंतजार
बाकी था
सावन तो बरस गया
लेकिन भादौ का बरसना
बाकी था

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

****प्रकृति का आरक्षण**
    ^^^^^^^^^^^^^^^^^^
प्रकृति से मानव का
जब से शुरू हुआ द्बंद
तब से प्रकृति
और मानव के बीच
बिगड़ गये सम्बध
अब पहले जैसी कहां
लगती मूसलाधार झड़ी
प्रकृति भी करने लगी
अब मानव जीवन से
धोखाधड़ी
मानव ने प्रकृति का
निर्ममता से किया दोहन
जिसमें पलता हैं जीवन
सांसें लेना भी हो गई दूभर
कम हुआ धरा सेऑक्सीजन
बारह मास झर-झर
बहते थे झरने
बारह मास कल-कल
बहती थी नदियां
जंगल-जंगल होता था
पशु-पक्षियों का गुंजन
मंगल-मंगल होता था
प्राणियों का जन-जीवन
उन पर हुआ आघात
प्रतिदिन, हुआ प्रतिघात
अब पुनः प्रकृति को
संवारने,निखारने का
नया लो संकल्प
करो सब मिलकर
पर्यावरण का संवरक्षण
करो प्रकृति को
बचाने का,आरक्षण

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

,***मंझधार-किनारे***
^^^^^^^^^^^^^^^^^^
नदी के हम
किनारे ढूंढते रहे
नदी के हम दो
धारे ढूंढते रहे
इतनी भीड़ में हम
हमारे ढूंढते रहे
कोई अभी तक
हमारा नहीं मिला
हम सहारे ढूंढते रहे
कश्तियां सामने थी
हम मांझी और
पतवार ढूंढते रहे
न पतवार मिली
न मांझी मिला
न किनारे मिले
न धारे मिले
हम मंझधार में
खड़े रहे
न कोई हमारे मिले

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

*अंतिम-सांसें*
 
लाश को अब
तुम क्यों
ढोने लगे हो
अब जवान से
बूढ़ा होने लगे हो
बचपन से चले
जवानी की मंजिल
बुढ़ापे में मुश्किल
बिमारियों का
हैं, खंजर
क्यों अपनी पीठ में
घोपने लगे हो
दिन भी अब
पहाड़ से लगने
लगे हैं
रातें भी अब
बड़ी लगने
लगी हैं
प्यास भी अब
बुझने लगी हैं
जीवनी की
सांसें भी अब
कम होने
लगी हैं
पहले बहुत
प्यारे थे,अब
सबको खलने
लगे हो
अब अंतिम
सांसों की ओर
बढ़ने लगे हो
खुदा मुझे जन्नत दें
यही दुआ,अब
खुदा से
करने लगे हो.

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

*
**प्रीतभरी-वाणी***

प्रीत भरी वाणी,
प्रीत भरे रंग
बंसत की बहार
फागुन का फाग
यौवन के उभरते क्षण
लगाये तन में अगन,
प्रेम प्रीत जैसा
चहुँ ओर खिल उठा
पलाश केसरिया रंग
अमलताश की चहक
गुलमोहर की दहक
कौकिला की गुंजन
मेघों का गर्जन
काली घटाओं से
पटा हुआ ये गगन
कभी गरजता
कभी बरसता
कभी बिजलियों
के साथ चमकता
ऋतुओं की,वर्षारानी
बादल,कालीघटा
इसकी जिंदगानी
प्रतिवर्ष दोहराता
ये अपने मौसम की कहानी
प्रकृति, जीवन को देता
ये नई जवानी
ये प्रीत भरे रंग
ये प्रीत भरी वाणी

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

***बड़े-बुजुर्ग***
^^^^^^^^^^^^^^
चारों ओर यहां
कैसा शोर हैं
चल रहा यहां
कैसा दौर हैं
क्या संस्कृति
सभ्यता और
संस्कारों का
यह अंतिम दौर हैं
बिखर गये जब से
संयुक्त परिवार
सभ्यता-संस्कृति और
संस्कारों का गया आधार
हम संस्कार
विहीन हो गये
हमारे संस्कार
पाश्चात्य सभ्यता में
कहां खो गये
जहां होता था
बड़े-बुजुर्गों का सम्मान
वह धराशायी हो गये
पग-पग में,घर-घर में
प्रतिदिन होता
उनका अपमान
कभी वो थे,घर की शान
आज वो दर-दर
भटक रहे,परिवार में
वो खटक रहे,
जिनके पैर आज
कब्र में हैं, लटक रहे
उनका भी एक
जमाना था
हर शख्स उनका
दीवाना था
आज वो तन से
हुवे कमजोर
मन-अनुभव में
अभी भी हैं जोर
यह ना समझो
खत्म हो गया हैं
बड़े-बुजुर्गों का दौर

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

रिश्तों को टपकने न दो
आम की तरह
बारिश के मौसम में
रिश्ते कहीं पानी की
बूंदों की तरह रिसने न लगे
रिश्तों की छत की
मरम्मत करवा लेना
कहीं पानी की तरह बहने न लगे
सभी संभाल कर रखियेगा
इसकी सबको जरूरत रहती हैं
दिल में रिश्तों की तिजोरी
बनाकर रखियेगा
कहीं यह खाली न हो जाये
कहीं कोई इसे लूट कर न ले जाये

  
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🎄🎄

जलते हुवे,
चराग आज
अंधेरों से,
लड़ रहे थे
आंधियां भी
कहां चुप रही
उसने तूफानों से
जाकर कह दिया
जल रहा हैं"दीया"
तूफानों ने भी
कह दिया
जलने दो"दीया"
मैं नतमस्तक हूँ
उसके हौसले के आगे
तुम क्यों खलल
डाल रही हो
वो जीया तो
अपने दम पर जीया
नहीं बुझेगा
अंधेरों में,
जलता हुआ"दीया"

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

जीवन की सांसे

जब तक सांस हैं
तब तक आस हैं
सांसों में हैं
जीवन की खुशियां
फिर मन क्यों
उदास-उदास हैं,
सारे रिश्ते नाते
जब पास पास हैं
अपने तरीकों से
बचपन से
बुढ़ापे तक जीया
जीवन आनंद
रस पीया
जीवन में महत्वाकांक्षाऐं
बढ़ती रही
फिर भी प्यास
अधूरी रही
न,जाने कितने
हमने सपने बुने
प्रतिपल,प्रतिफल
सपने पूरे होने की
चाह रही
इसी चाह में
न,जाने जीवन की
सांसे कब थम गई
न,भोर रहा
न,सांस रही
जीवन की पहेली
अबूझ रही

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

****बाकी***
    ********
जीवन की हैं
यही सच्चाई
मेरे बड़े भाई
मकान हैं
किराए का
सामान हैं,उधार
किराने का
पेपर का बिल लिये
दरवाजे पर खड़ा हैं
अभी दूध वाले की
उधारी चुकाना बाकी हैं
मां की तबीयत
खराब हैं,
पिताजी को भी
डाक्टर को दिखाना बाकी हैं
घर खर्च कम तनख्वाह में
चलाना,नामुमकिन ही नहीं
एक मुश्किल काम हैं
कहते हैं, जीवन एक संघर्ष हैं
लेकिन जीना हराम हैं
मेहनत में कोई कसर
नहीं बाकी हैं
बच्चों की पढ़ाई-लिखाई
बहन की अभी
शादी करना बाकी हैं
यूं तो सामजिक खर्चे
रस्म रिवाज निभाना
उधार लेकर घर चलाना
एक से लेना,
दूसरे को चुकाना
सेठ-साहुकारों की
खरी-खोटी सुनना
ये सब बाकी हैं
पुश्तैनी मकान
पहले से ही कर्ज में
बिक चुका हैं, और
बाद की उधारी का
कर्ज चुकाना बाकी हैं
उधारी और कर्ज में
जिंदगी गुजर रही हैं
अभी तो और
जिंदगी गुजारना बाकी हैं

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

आग

ये धुआं उठता हैं,तो
उठने दे
ये आग जलती हैं, तो
जलने दे
ये नफरतों के साये हैं
इन्होंने जख्म दिये हैं
बहुत गहरे
ये जलते हैं, तो
जलने दे
ये मोहब्बतें
जला नहीं करती
ये इंसानों के दिलों में
रहती हैं,जो
इंसानों पर मरती हैं
ये शैतानों के दिलों में
बसा नहीं करती

,🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

*दहलीज*

घर की दहलीज पर
प्रश्न भरी निगाहों से
वह एकटक दृष्टि से
बाहर-फिर भीतर
देख रही थी
भीतर क्या हैं
बाहर क्या हैं
वह अपने आप
अपने ही प्रश्नों का
उत्तर ढूंढ रही थी
पहले बेटी फिर बहन
बीबी और फिर मां
से अपने सवाल का
जवाब पूछ रही थी
समय परिवर्तन के साथ
अपने रिश्ते-नाते
वह बदल रही थी
प्रतिदिन वह अपने
फर्ज को निभाने के लिये
वह अपने घर की
दहलीज पर
नीत नये सपने
बुन रही थी,
शायद उसे कहीं
अपने प्रश्नों का
उत्तर मिल जाये
इसी उधेड़ बुन में
अपनी चौखट पर खड़ी थ

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

"क्यों अंर्तमन व्यथित हुआ"

क्यों अंर्तमन विचलित हुआ
क्यों अभिशप्त होकर
                    शापित हुआ
क्यों तन की पीड़ा से
क्यों मन की पीड़ा से
                      ग्रसित हुआ
क्या दोष हैं कर्मो का
क्यों नहीं पश्चाताप हुआ
रिश्ते नातों के छल से
काम,क्रोध, मद लोभ से
अंर्तमन-हृदय, क्यों दूषित हुआ
जीवन के इन सारे कर्मों से
क्यों नहीं अंतःकरण लंबित हुआ
क्यों नहीं अंर्तमन निलंबित हुआ
क्यों नहीं इस जीवन के सारे
झंझावत से मुक्त हुआ
क्यों इस सारे जीवन के
झमेलों से युक्त हुआ
🙏🏽📝✍🏽*आर.डी.वैरागी*UR**
**स्वरचित**🌾🌿🍀🍃🍂👏

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

जीवन एक छांव
जीवन एक धूप
मैं भी चुप
तुम भी चुप
फिर द्वंद्व कहां
कौन हैं, जो मौन हैं
कहीं कर्म की बातें
कहीं धर्म की बातें
कहीं अधर्म की बातें
जीवन एक झंझावत
क्या सही,क्या गलत
पाप-पुण्यों का नापतौल
जहां से हम चले फिर वहीं
धरा घुमती,अपनी धुरी गोल
यह मोह माया का बिछा जाल
यह रिश्तों का आपसी मेल-जोल
इस जीवन से हमने क्या पाया
इस जीवन से हमने क्या खोया
क्या हमने तौल मौल कर कर्म किया
क्या हमने तौल मौल कर धर्म किया
क्या हमने तौल मौल कर अधर्म किया
जीवन की इस किताब में
नहीं हैं कोई हिसाब
बस जीते जागते,सोते जागते
हम हर दिन देखते रहे ख्वाब
एक दिन हमनेआंखें मूंद ली चुपचाप
न दिन था,न सवेरा था
न,कोई तेरा था,
न,कोई मेरा था,
बस जीवन एक
रैन बसेरा था
एक मुसाफिर की तरह
आये और चल दिये

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

वो आज गमगीन हो गया,
जो खुशी से था रंगीन,
वो आज रंगहीन हो गया,
जीवन की गाड़ी के थे,
जो दो पहिये,
उसमें से आज,
एक पंक्चर हो गया,
ईश्वर को इतना ही,
साथ मंजूर था,
जो आज उनसे दूर हो गया,
जो अभी तक,
साथ निभाने को,
उनका अपना था,वो खो गया,
भूली बिखरी यादें, हुई स्थिर
तन-मन बोझिल हुआ अधीर
कौन जाने उनकी पीर
जीवन की उड़ान तो
उड़ना चाहती थी संग-संग
लेकिन मौत से ना,
जीत सकी वह जंग,
एक दिन सबको जाना हैं,
मृत्यु अटल सत्य हैं,
आगे-पीछे आना हैं,
परमेश्वर उनको अपने
श्रीचरणों में स्थान दें
उनकी आज अपूरणीय ,
क्षति हुई हैं,संबल दें
उनकी आत्मा को शांति दें

**आर.डी.वैरागी**

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

आज का दिन,
क्यों सकून भरा,
नहीं निकला,
जब में था,
घर से निकला,
अखबार में,
खबर छपी थी,
टी.वी पर,
खबर सुनी,
पढ़ी थी,
कुछ जेहादियों ने
कत्लेआम मचा
रखा हैं,
वह देश का सिपाही
शहीद हुआ हैं,
शहीद होने वाले
सिपाही का नाम हुआ हैं
पत्नी-बच्चे, मां-बाप
बिलख-बिलख कर
रो रहे हैं, पूरे घर में
मातम छाया हुआ हैं
इस पर नेताओं की
बयानबाजी और
राजनीति का
रंग चढ़ा हुआ हैं
कोरी लफ्फेबाजी हैं
आज तक नहीं कोई
रणनीति का "अहम"
फैसला हुआ है
कब तक हम सैनिकों के
सिर कटवाकर हम
बली का बकरा बनायेंगे...?
कब हम चैन की,नींद सो पायेंगे

**आर.डी.वैरागी**

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

तुम निर्झर पथगामिनी ही नहीं
तुम लोह पथगामिनी हो
तुम जीवन संगिनी ही नहीं
तुम अर्धांगिनी भी हो,
तुम घर संसार में
रची-बसी हो
अपने पति-परमेश्वर की भी
तुम सबला प्यारी नारी हो
बच्चों की ममता समेटे
अपने आँचल में
बच्चों की राज दुलारी हो
सास-ससुर की सेवा करना
मर्यादाओं में रहकर
अपना कर्तव्य निभाना
नहीं समझती,
अपनी कोई लाचारी
तुम शक्ति-स्वरूपा संस्कार लिये
भारत की अखंड नारी हो
इसीलिये तुम पुरूषों पर भारी हो

**आर.डी.वैरागी**

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯

मंद-मंद बैचैन हुई पवन,
धीर-अधीर हुआ हृदय मन,
ग्रीष्म ऋतु की यह तपन,
उद्वैलित उत्तेजन करती,
ये हृदय की धड़कन,
सागर से बहती
ये मंद-मंद जल समीर
देती अजीब,जीवन आनंद,
ये धरा से बहती,
धूल-धूषरित थल समीर
ये हर लेती जीवन आनंद
प्रकृति भी पल-प्रतिपल
बदलती हैं, अपना रंग
प्रातः की बहती पूर्वा
देती जीवन को आनंद
दिवाकर की लाली
ऐसी लगती, जैसे
नवयौवना के
होठों की हो लाली
उदित होती जब ये
भोर किरण
जैसे उमर हो बाली
जाग जाते सब,प्राणी जन
नव चेतना का,यह आवरण
कूहूं कूहूं करती कोयल
पंछी गाते चहचाते
करते कलरव- कलरव
प्रकृति का सुंदर दृश्य मनोरम
मोह लेता हैं मन
देता हैं सुखद जीवन का आनंद

**आर.डी.वैरागी**

😐🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

🙏🏽📝✍🏽अति सुंदर🌾🌿💐
मैं सुमन,तुम पवन
दोनों मिलकर,
महकाए चमन
बिखेर दे खुशबू
महक जाए गगन
मैं,मैं ना रहूं
तुम,तुम ना रहो
भीग जाए, तन-मन
जीवन की हर सांस में
जीवन की हर प्यास में
खत्म ना हो,ये लगन
बस हम दोनों रहे मगन
घूंघट की मर्यादाओं में
बस प्रेम का हो नमन
खिल उठे ये चमन

🙏🏽📝✍🏽आर.डी.वैरागी**UR**

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

पर्यावरण

इस धरा से,
अब पेड़ पौधे,
गायब होने लगे हैं,
जब से मनुष्य इनका,
दुश्मन बना हैं,
धरती से ठंडी छांव,
हवाऐं भी पलायन,
करने लगी हैं,
पर्यावरण का संतुलन,
चारों-ओर बिगड़ने लगा हैं,
केकट्स जैसे कांटे,
अब बदन में,चुभने लगे हैं,
आम नीम पीपल बरगद,
सब मानव की दानवता से,
शहीद हो गये हैं,
बचे-कुचे,कुछ पेड़-पौधे
शरीफ इंसानों की,
पनाह में आ गये हैं,
जो आज जिंदा हैं,
उससे हम सांस,
ले रहे हैं....लेकिन
चंद पेड़-पौधे,
इस भीषण गर्मी के आगे,
कहां दम भर रहे हैं
🙏🏽📝✍🏽आर.डी.वैरागी**स्वरचित
*UR***🌾☘☘🌿🍃👏

यहाँ समरसता का
कहाँ भाव हैं,
यहाँ तो जिंदगी में
कितना कहाँ,अभाव हैं
कौन इसका, सही ढंग से
आंकलन कर रहा हैं,
यहाँ तो वोट के लिये
राजनीति में, क्षण,प्रतिक्षण
गिरगिट की तरह,
रंग बदल रहा हैं
नोट के रंग तो
कभी-कभी बदलते हैं,

आम लोग तो
हर बार छलाये जाते हैं
हम अपने बच्चों की
क्या बात करें
वो तो आज के
वातावरण से
प्रदूषित होकर
अपना रंग और ढंग
राजनीति की तरह
घर में भी बदलते हैं
पहले माटी के,चू्ल्हे थे
अब गैस के,चूल्हे हो गये
जो हर घर में,जलते हैं

आर.डी.वैरागी

🎄🎄🎄🎄🎄🎄

कश्तीयों में
गुजार दी जिंदगी
मस्तीयों में
गुजार दी जिंदगी
सागर के वो,किनारे थे
लहरों के वो,धारे थे
कभी तुम,हमारे थे
कभी हम,तुम्हारे थे
हम दोनों ही,
एक दूसरे को,प्यारे थे
जिंदगी ने, ली करवट
कुछ लम्हे,तन्हाई में
गुजारे थे,
वक्त गुजर गया
वो लम्हे, नहीं
हमारे थे
आज हम उनके हैं
वो हमारे हैं,
वो बहुत प्यारे हैं

***आर.डी.वैरागी***

समय की कोंख से

🌹🌺💐🎉🌺🥀

प्यार का गीत,
लिखती हैं, जिंदगी
मन का मीत,
लिखती हैं, जिंदगी,
प्यार का रंग हैं, जिंदगी
प्यार की उमंग हैं, जिंदगी
दिल की धड़कन हैं, जिंदगी
दिल की सांसों में हैं, जिंदगी
जीवन की खुशी हैं, जिंदगी
जीवन का गम भी हैं, जिंदगी
आती-जाती हर सांस में हैं,जिंदगी
कभी जिंदगी की हार
लिखती हैं, जिंदगी
कभी जिंदगी की जीत
लिखती हैं, जिंदगी
हर ख्वाब में हैं, जिंदगी
हर खयाल में हैं, जिंदगी
दिलों जान हैं, जिंदगी
दिलों शान हैं, जिंदगी
दिलों का गुमान हैं, जिंदगी
दिलों का अरमान हैं, जिंदगी
दिलों का नाम हैं, जिंदगी
दिलों का पैगाम हैं, जिंदगी
कहां-कहां नहीं हैं,जिंदगी
चारों तरफ हैं, जिंदगी
जीवन ही जिंदगी का नाम हैं,
जीना ही, जिंदगी का पैगाम हैं
***आर.डी.वैरागी***स्वरचित***
UR***🙏🏽📝✍🏽🌿🍃🍂👏

कहीं तो कोई
उम्मीद का दीया
जलाकर बैठा हैं,
सब एक जैसे
लिपिक भाई नहीं जो
ना उम्मीद का दीया
जलाकर बैठा हो,
जिसने दीया
जलाया ही नहीं,
बस उससे पूछना बाकी हैं
क्या तुम्हारे उम्मीद के
दीये का तेल खत्म
हो गया हैं, क्या....?
उम्मीद का दीया तो
हम भी जलाकर बैठे हैं,
कब तक यह ,मान कर बैठे
अब उजाला होने वाला हैं,
पता नहीं, अंधेरों से
निजात कब मिलेगी...।?
🏽आर.डी.वैरागी*

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

जीवन में कई,
रंग भरे हैं,
चाहत के रंग से,
कब उभरे हैं,
दिल की चाहतों ने,
कभी घाव दिये हैं,
कभी घाव भरे हैं,
जीवन में कई,
रंग भरे हैं,
चाहत के ये कितने,
नज़ाकत रिश्ते
चाहत के ये कितने,
शरारत रिश्ते,
कितने उथले,
कितने गहरे हैं,
जीवन में कई,
रंग भरे हैं,
सागर हैं, कितना गहरा
उस पर हैं, लहरों का पहरा
दरियाओं का किनारा,
उसका हैं, सहारा
सागर ने भी,
कितने जख्म सहे हैं,
जो साहिल से कहे हैं,
जीवन में कई,
रंग भरे हैं
🙏🏽📝✍🏽आर.डी.वैरागी*स्वरचित
🍀🌺💕❤💕☘💐🌾👏

कश्तीयों में
गुजार दी जिंदगी
मस्तीयों में
गुजार दी जिंदगी
सागर के वो,किनारे थे
लहरों के वो,धारे थे
कभी तुम,हमारे थे
कभी हम,तुम्हारे थे
हम दोनों ही,
एक दूसरे को,प्यारे थे
जिंदगी ने, ली करवट
कुछ लम्हे,तन्हाई में
गुजारे थे,
वक्त गुजर गया
वो लम्हे, नहीं
हमारे थे
आज हम उनके हैं
वो हमारे हैं,
वो बहुत प्यारे हैं

आर.डी.वैरागी