ज़िन्दगी की दुकान पर हम सबकी उधारी है,
चलती हुई सांसो का उधार, बहुत भारी है..
ज़िन्दगी है कभी बहार, तो कभी पतझड़ भी है,
कभी फूल की पत्ती है, तो कभी चिंगारी है..
इन मासूम और सीधे चहरो पर, ऐतबार मत करना,
शहर में सियासत के, कुछ दोस्त भी शिकारी हैं..
मोड़ लेने वाली है, ज़िन्दगी कोई शायद,
अब के फिर इन हवाओं में एक बेकरारी है..
वक्त की धूप उढ़ाती है जब अपना आँचल,
ज़िन्दगी अपनी माँ की तरह लगती प्यारी है..
ज़िन्दगी की दुकान पर हम सबकी उधारी है,
चलती हुई सांसो का उधार, बहुत भारी है..
ओम प्रकाश चतुर्वेदी
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