Thursday, 27 April 2017

आर.डी. वैरागी

***बरसना बाकी हैं***
^^^--^^^--^^^--^^^--^^
हवा तो चल रही थी
उसका रुख बदलना
बाकी था
चमन में तो फूल
खिले थे
लेकिन उसका महकना
बाकी था
चमन की फिज़ाएं भी
कह रही थी
अभी उसकी
बहार का बहना
बाकी था
यौवन तो भरपूर था
लेकिन अभी
उसका छलकना
बाकी था
महकने,बहकने,खिलने
को वोआतुर हैं
बस सही वक्त और
मौसम का इंतजार
बाकी था
सावन तो बरस गया
लेकिन भादौ का बरसना
बाकी था

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

****प्रकृति का आरक्षण**
    ^^^^^^^^^^^^^^^^^^
प्रकृति से मानव का
जब से शुरू हुआ द्बंद
तब से प्रकृति
और मानव के बीच
बिगड़ गये सम्बध
अब पहले जैसी कहां
लगती मूसलाधार झड़ी
प्रकृति भी करने लगी
अब मानव जीवन से
धोखाधड़ी
मानव ने प्रकृति का
निर्ममता से किया दोहन
जिसमें पलता हैं जीवन
सांसें लेना भी हो गई दूभर
कम हुआ धरा सेऑक्सीजन
बारह मास झर-झर
बहते थे झरने
बारह मास कल-कल
बहती थी नदियां
जंगल-जंगल होता था
पशु-पक्षियों का गुंजन
मंगल-मंगल होता था
प्राणियों का जन-जीवन
उन पर हुआ आघात
प्रतिदिन, हुआ प्रतिघात
अब पुनः प्रकृति को
संवारने,निखारने का
नया लो संकल्प
करो सब मिलकर
पर्यावरण का संवरक्षण
करो प्रकृति को
बचाने का,आरक्षण

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

,***मंझधार-किनारे***
^^^^^^^^^^^^^^^^^^
नदी के हम
किनारे ढूंढते रहे
नदी के हम दो
धारे ढूंढते रहे
इतनी भीड़ में हम
हमारे ढूंढते रहे
कोई अभी तक
हमारा नहीं मिला
हम सहारे ढूंढते रहे
कश्तियां सामने थी
हम मांझी और
पतवार ढूंढते रहे
न पतवार मिली
न मांझी मिला
न किनारे मिले
न धारे मिले
हम मंझधार में
खड़े रहे
न कोई हमारे मिले

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

*अंतिम-सांसें*
 
लाश को अब
तुम क्यों
ढोने लगे हो
अब जवान से
बूढ़ा होने लगे हो
बचपन से चले
जवानी की मंजिल
बुढ़ापे में मुश्किल
बिमारियों का
हैं, खंजर
क्यों अपनी पीठ में
घोपने लगे हो
दिन भी अब
पहाड़ से लगने
लगे हैं
रातें भी अब
बड़ी लगने
लगी हैं
प्यास भी अब
बुझने लगी हैं
जीवनी की
सांसें भी अब
कम होने
लगी हैं
पहले बहुत
प्यारे थे,अब
सबको खलने
लगे हो
अब अंतिम
सांसों की ओर
बढ़ने लगे हो
खुदा मुझे जन्नत दें
यही दुआ,अब
खुदा से
करने लगे हो.

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

*
**प्रीतभरी-वाणी***

प्रीत भरी वाणी,
प्रीत भरे रंग
बंसत की बहार
फागुन का फाग
यौवन के उभरते क्षण
लगाये तन में अगन,
प्रेम प्रीत जैसा
चहुँ ओर खिल उठा
पलाश केसरिया रंग
अमलताश की चहक
गुलमोहर की दहक
कौकिला की गुंजन
मेघों का गर्जन
काली घटाओं से
पटा हुआ ये गगन
कभी गरजता
कभी बरसता
कभी बिजलियों
के साथ चमकता
ऋतुओं की,वर्षारानी
बादल,कालीघटा
इसकी जिंदगानी
प्रतिवर्ष दोहराता
ये अपने मौसम की कहानी
प्रकृति, जीवन को देता
ये नई जवानी
ये प्रीत भरे रंग
ये प्रीत भरी वाणी

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

***बड़े-बुजुर्ग***
^^^^^^^^^^^^^^
चारों ओर यहां
कैसा शोर हैं
चल रहा यहां
कैसा दौर हैं
क्या संस्कृति
सभ्यता और
संस्कारों का
यह अंतिम दौर हैं
बिखर गये जब से
संयुक्त परिवार
सभ्यता-संस्कृति और
संस्कारों का गया आधार
हम संस्कार
विहीन हो गये
हमारे संस्कार
पाश्चात्य सभ्यता में
कहां खो गये
जहां होता था
बड़े-बुजुर्गों का सम्मान
वह धराशायी हो गये
पग-पग में,घर-घर में
प्रतिदिन होता
उनका अपमान
कभी वो थे,घर की शान
आज वो दर-दर
भटक रहे,परिवार में
वो खटक रहे,
जिनके पैर आज
कब्र में हैं, लटक रहे
उनका भी एक
जमाना था
हर शख्स उनका
दीवाना था
आज वो तन से
हुवे कमजोर
मन-अनुभव में
अभी भी हैं जोर
यह ना समझो
खत्म हो गया हैं
बड़े-बुजुर्गों का दौर

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

रिश्तों को टपकने न दो
आम की तरह
बारिश के मौसम में
रिश्ते कहीं पानी की
बूंदों की तरह रिसने न लगे
रिश्तों की छत की
मरम्मत करवा लेना
कहीं पानी की तरह बहने न लगे
सभी संभाल कर रखियेगा
इसकी सबको जरूरत रहती हैं
दिल में रिश्तों की तिजोरी
बनाकर रखियेगा
कहीं यह खाली न हो जाये
कहीं कोई इसे लूट कर न ले जाये

  
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🎄🎄

जलते हुवे,
चराग आज
अंधेरों से,
लड़ रहे थे
आंधियां भी
कहां चुप रही
उसने तूफानों से
जाकर कह दिया
जल रहा हैं"दीया"
तूफानों ने भी
कह दिया
जलने दो"दीया"
मैं नतमस्तक हूँ
उसके हौसले के आगे
तुम क्यों खलल
डाल रही हो
वो जीया तो
अपने दम पर जीया
नहीं बुझेगा
अंधेरों में,
जलता हुआ"दीया"

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

जीवन की सांसे

जब तक सांस हैं
तब तक आस हैं
सांसों में हैं
जीवन की खुशियां
फिर मन क्यों
उदास-उदास हैं,
सारे रिश्ते नाते
जब पास पास हैं
अपने तरीकों से
बचपन से
बुढ़ापे तक जीया
जीवन आनंद
रस पीया
जीवन में महत्वाकांक्षाऐं
बढ़ती रही
फिर भी प्यास
अधूरी रही
न,जाने कितने
हमने सपने बुने
प्रतिपल,प्रतिफल
सपने पूरे होने की
चाह रही
इसी चाह में
न,जाने जीवन की
सांसे कब थम गई
न,भोर रहा
न,सांस रही
जीवन की पहेली
अबूझ रही

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

****बाकी***
    ********
जीवन की हैं
यही सच्चाई
मेरे बड़े भाई
मकान हैं
किराए का
सामान हैं,उधार
किराने का
पेपर का बिल लिये
दरवाजे पर खड़ा हैं
अभी दूध वाले की
उधारी चुकाना बाकी हैं
मां की तबीयत
खराब हैं,
पिताजी को भी
डाक्टर को दिखाना बाकी हैं
घर खर्च कम तनख्वाह में
चलाना,नामुमकिन ही नहीं
एक मुश्किल काम हैं
कहते हैं, जीवन एक संघर्ष हैं
लेकिन जीना हराम हैं
मेहनत में कोई कसर
नहीं बाकी हैं
बच्चों की पढ़ाई-लिखाई
बहन की अभी
शादी करना बाकी हैं
यूं तो सामजिक खर्चे
रस्म रिवाज निभाना
उधार लेकर घर चलाना
एक से लेना,
दूसरे को चुकाना
सेठ-साहुकारों की
खरी-खोटी सुनना
ये सब बाकी हैं
पुश्तैनी मकान
पहले से ही कर्ज में
बिक चुका हैं, और
बाद की उधारी का
कर्ज चुकाना बाकी हैं
उधारी और कर्ज में
जिंदगी गुजर रही हैं
अभी तो और
जिंदगी गुजारना बाकी हैं

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

आग

ये धुआं उठता हैं,तो
उठने दे
ये आग जलती हैं, तो
जलने दे
ये नफरतों के साये हैं
इन्होंने जख्म दिये हैं
बहुत गहरे
ये जलते हैं, तो
जलने दे
ये मोहब्बतें
जला नहीं करती
ये इंसानों के दिलों में
रहती हैं,जो
इंसानों पर मरती हैं
ये शैतानों के दिलों में
बसा नहीं करती

,🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

*दहलीज*

घर की दहलीज पर
प्रश्न भरी निगाहों से
वह एकटक दृष्टि से
बाहर-फिर भीतर
देख रही थी
भीतर क्या हैं
बाहर क्या हैं
वह अपने आप
अपने ही प्रश्नों का
उत्तर ढूंढ रही थी
पहले बेटी फिर बहन
बीबी और फिर मां
से अपने सवाल का
जवाब पूछ रही थी
समय परिवर्तन के साथ
अपने रिश्ते-नाते
वह बदल रही थी
प्रतिदिन वह अपने
फर्ज को निभाने के लिये
वह अपने घर की
दहलीज पर
नीत नये सपने
बुन रही थी,
शायद उसे कहीं
अपने प्रश्नों का
उत्तर मिल जाये
इसी उधेड़ बुन में
अपनी चौखट पर खड़ी थ

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

"क्यों अंर्तमन व्यथित हुआ"

क्यों अंर्तमन विचलित हुआ
क्यों अभिशप्त होकर
                    शापित हुआ
क्यों तन की पीड़ा से
क्यों मन की पीड़ा से
                      ग्रसित हुआ
क्या दोष हैं कर्मो का
क्यों नहीं पश्चाताप हुआ
रिश्ते नातों के छल से
काम,क्रोध, मद लोभ से
अंर्तमन-हृदय, क्यों दूषित हुआ
जीवन के इन सारे कर्मों से
क्यों नहीं अंतःकरण लंबित हुआ
क्यों नहीं अंर्तमन निलंबित हुआ
क्यों नहीं इस जीवन के सारे
झंझावत से मुक्त हुआ
क्यों इस सारे जीवन के
झमेलों से युक्त हुआ
🙏🏽📝✍🏽*आर.डी.वैरागी*UR**
**स्वरचित**🌾🌿🍀🍃🍂👏

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

जीवन एक छांव
जीवन एक धूप
मैं भी चुप
तुम भी चुप
फिर द्वंद्व कहां
कौन हैं, जो मौन हैं
कहीं कर्म की बातें
कहीं धर्म की बातें
कहीं अधर्म की बातें
जीवन एक झंझावत
क्या सही,क्या गलत
पाप-पुण्यों का नापतौल
जहां से हम चले फिर वहीं
धरा घुमती,अपनी धुरी गोल
यह मोह माया का बिछा जाल
यह रिश्तों का आपसी मेल-जोल
इस जीवन से हमने क्या पाया
इस जीवन से हमने क्या खोया
क्या हमने तौल मौल कर कर्म किया
क्या हमने तौल मौल कर धर्म किया
क्या हमने तौल मौल कर अधर्म किया
जीवन की इस किताब में
नहीं हैं कोई हिसाब
बस जीते जागते,सोते जागते
हम हर दिन देखते रहे ख्वाब
एक दिन हमनेआंखें मूंद ली चुपचाप
न दिन था,न सवेरा था
न,कोई तेरा था,
न,कोई मेरा था,
बस जीवन एक
रैन बसेरा था
एक मुसाफिर की तरह
आये और चल दिये

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

वो आज गमगीन हो गया,
जो खुशी से था रंगीन,
वो आज रंगहीन हो गया,
जीवन की गाड़ी के थे,
जो दो पहिये,
उसमें से आज,
एक पंक्चर हो गया,
ईश्वर को इतना ही,
साथ मंजूर था,
जो आज उनसे दूर हो गया,
जो अभी तक,
साथ निभाने को,
उनका अपना था,वो खो गया,
भूली बिखरी यादें, हुई स्थिर
तन-मन बोझिल हुआ अधीर
कौन जाने उनकी पीर
जीवन की उड़ान तो
उड़ना चाहती थी संग-संग
लेकिन मौत से ना,
जीत सकी वह जंग,
एक दिन सबको जाना हैं,
मृत्यु अटल सत्य हैं,
आगे-पीछे आना हैं,
परमेश्वर उनको अपने
श्रीचरणों में स्थान दें
उनकी आज अपूरणीय ,
क्षति हुई हैं,संबल दें
उनकी आत्मा को शांति दें

**आर.डी.वैरागी**

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

आज का दिन,
क्यों सकून भरा,
नहीं निकला,
जब में था,
घर से निकला,
अखबार में,
खबर छपी थी,
टी.वी पर,
खबर सुनी,
पढ़ी थी,
कुछ जेहादियों ने
कत्लेआम मचा
रखा हैं,
वह देश का सिपाही
शहीद हुआ हैं,
शहीद होने वाले
सिपाही का नाम हुआ हैं
पत्नी-बच्चे, मां-बाप
बिलख-बिलख कर
रो रहे हैं, पूरे घर में
मातम छाया हुआ हैं
इस पर नेताओं की
बयानबाजी और
राजनीति का
रंग चढ़ा हुआ हैं
कोरी लफ्फेबाजी हैं
आज तक नहीं कोई
रणनीति का "अहम"
फैसला हुआ है
कब तक हम सैनिकों के
सिर कटवाकर हम
बली का बकरा बनायेंगे...?
कब हम चैन की,नींद सो पायेंगे

**आर.डी.वैरागी**

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

तुम निर्झर पथगामिनी ही नहीं
तुम लोह पथगामिनी हो
तुम जीवन संगिनी ही नहीं
तुम अर्धांगिनी भी हो,
तुम घर संसार में
रची-बसी हो
अपने पति-परमेश्वर की भी
तुम सबला प्यारी नारी हो
बच्चों की ममता समेटे
अपने आँचल में
बच्चों की राज दुलारी हो
सास-ससुर की सेवा करना
मर्यादाओं में रहकर
अपना कर्तव्य निभाना
नहीं समझती,
अपनी कोई लाचारी
तुम शक्ति-स्वरूपा संस्कार लिये
भारत की अखंड नारी हो
इसीलिये तुम पुरूषों पर भारी हो

**आर.डी.वैरागी**

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯

मंद-मंद बैचैन हुई पवन,
धीर-अधीर हुआ हृदय मन,
ग्रीष्म ऋतु की यह तपन,
उद्वैलित उत्तेजन करती,
ये हृदय की धड़कन,
सागर से बहती
ये मंद-मंद जल समीर
देती अजीब,जीवन आनंद,
ये धरा से बहती,
धूल-धूषरित थल समीर
ये हर लेती जीवन आनंद
प्रकृति भी पल-प्रतिपल
बदलती हैं, अपना रंग
प्रातः की बहती पूर्वा
देती जीवन को आनंद
दिवाकर की लाली
ऐसी लगती, जैसे
नवयौवना के
होठों की हो लाली
उदित होती जब ये
भोर किरण
जैसे उमर हो बाली
जाग जाते सब,प्राणी जन
नव चेतना का,यह आवरण
कूहूं कूहूं करती कोयल
पंछी गाते चहचाते
करते कलरव- कलरव
प्रकृति का सुंदर दृश्य मनोरम
मोह लेता हैं मन
देता हैं सुखद जीवन का आनंद

**आर.डी.वैरागी**

😐🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

🙏🏽📝✍🏽अति सुंदर🌾🌿💐
मैं सुमन,तुम पवन
दोनों मिलकर,
महकाए चमन
बिखेर दे खुशबू
महक जाए गगन
मैं,मैं ना रहूं
तुम,तुम ना रहो
भीग जाए, तन-मन
जीवन की हर सांस में
जीवन की हर प्यास में
खत्म ना हो,ये लगन
बस हम दोनों रहे मगन
घूंघट की मर्यादाओं में
बस प्रेम का हो नमन
खिल उठे ये चमन

🙏🏽📝✍🏽आर.डी.वैरागी**UR**

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

पर्यावरण

इस धरा से,
अब पेड़ पौधे,
गायब होने लगे हैं,
जब से मनुष्य इनका,
दुश्मन बना हैं,
धरती से ठंडी छांव,
हवाऐं भी पलायन,
करने लगी हैं,
पर्यावरण का संतुलन,
चारों-ओर बिगड़ने लगा हैं,
केकट्स जैसे कांटे,
अब बदन में,चुभने लगे हैं,
आम नीम पीपल बरगद,
सब मानव की दानवता से,
शहीद हो गये हैं,
बचे-कुचे,कुछ पेड़-पौधे
शरीफ इंसानों की,
पनाह में आ गये हैं,
जो आज जिंदा हैं,
उससे हम सांस,
ले रहे हैं....लेकिन
चंद पेड़-पौधे,
इस भीषण गर्मी के आगे,
कहां दम भर रहे हैं
🙏🏽📝✍🏽आर.डी.वैरागी**स्वरचित
*UR***🌾☘☘🌿🍃👏

यहाँ समरसता का
कहाँ भाव हैं,
यहाँ तो जिंदगी में
कितना कहाँ,अभाव हैं
कौन इसका, सही ढंग से
आंकलन कर रहा हैं,
यहाँ तो वोट के लिये
राजनीति में, क्षण,प्रतिक्षण
गिरगिट की तरह,
रंग बदल रहा हैं
नोट के रंग तो
कभी-कभी बदलते हैं,

आम लोग तो
हर बार छलाये जाते हैं
हम अपने बच्चों की
क्या बात करें
वो तो आज के
वातावरण से
प्रदूषित होकर
अपना रंग और ढंग
राजनीति की तरह
घर में भी बदलते हैं
पहले माटी के,चू्ल्हे थे
अब गैस के,चूल्हे हो गये
जो हर घर में,जलते हैं

आर.डी.वैरागी

🎄🎄🎄🎄🎄🎄

कश्तीयों में
गुजार दी जिंदगी
मस्तीयों में
गुजार दी जिंदगी
सागर के वो,किनारे थे
लहरों के वो,धारे थे
कभी तुम,हमारे थे
कभी हम,तुम्हारे थे
हम दोनों ही,
एक दूसरे को,प्यारे थे
जिंदगी ने, ली करवट
कुछ लम्हे,तन्हाई में
गुजारे थे,
वक्त गुजर गया
वो लम्हे, नहीं
हमारे थे
आज हम उनके हैं
वो हमारे हैं,
वो बहुत प्यारे हैं

***आर.डी.वैरागी***

समय की कोंख से

🌹🌺💐🎉🌺🥀

प्यार का गीत,
लिखती हैं, जिंदगी
मन का मीत,
लिखती हैं, जिंदगी,
प्यार का रंग हैं, जिंदगी
प्यार की उमंग हैं, जिंदगी
दिल की धड़कन हैं, जिंदगी
दिल की सांसों में हैं, जिंदगी
जीवन की खुशी हैं, जिंदगी
जीवन का गम भी हैं, जिंदगी
आती-जाती हर सांस में हैं,जिंदगी
कभी जिंदगी की हार
लिखती हैं, जिंदगी
कभी जिंदगी की जीत
लिखती हैं, जिंदगी
हर ख्वाब में हैं, जिंदगी
हर खयाल में हैं, जिंदगी
दिलों जान हैं, जिंदगी
दिलों शान हैं, जिंदगी
दिलों का गुमान हैं, जिंदगी
दिलों का अरमान हैं, जिंदगी
दिलों का नाम हैं, जिंदगी
दिलों का पैगाम हैं, जिंदगी
कहां-कहां नहीं हैं,जिंदगी
चारों तरफ हैं, जिंदगी
जीवन ही जिंदगी का नाम हैं,
जीना ही, जिंदगी का पैगाम हैं
***आर.डी.वैरागी***स्वरचित***
UR***🙏🏽📝✍🏽🌿🍃🍂👏

कहीं तो कोई
उम्मीद का दीया
जलाकर बैठा हैं,
सब एक जैसे
लिपिक भाई नहीं जो
ना उम्मीद का दीया
जलाकर बैठा हो,
जिसने दीया
जलाया ही नहीं,
बस उससे पूछना बाकी हैं
क्या तुम्हारे उम्मीद के
दीये का तेल खत्म
हो गया हैं, क्या....?
उम्मीद का दीया तो
हम भी जलाकर बैठे हैं,
कब तक यह ,मान कर बैठे
अब उजाला होने वाला हैं,
पता नहीं, अंधेरों से
निजात कब मिलेगी...।?
🏽आर.डी.वैरागी*

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

जीवन में कई,
रंग भरे हैं,
चाहत के रंग से,
कब उभरे हैं,
दिल की चाहतों ने,
कभी घाव दिये हैं,
कभी घाव भरे हैं,
जीवन में कई,
रंग भरे हैं,
चाहत के ये कितने,
नज़ाकत रिश्ते
चाहत के ये कितने,
शरारत रिश्ते,
कितने उथले,
कितने गहरे हैं,
जीवन में कई,
रंग भरे हैं,
सागर हैं, कितना गहरा
उस पर हैं, लहरों का पहरा
दरियाओं का किनारा,
उसका हैं, सहारा
सागर ने भी,
कितने जख्म सहे हैं,
जो साहिल से कहे हैं,
जीवन में कई,
रंग भरे हैं
🙏🏽📝✍🏽आर.डी.वैरागी*स्वरचित
🍀🌺💕❤💕☘💐🌾👏

कश्तीयों में
गुजार दी जिंदगी
मस्तीयों में
गुजार दी जिंदगी
सागर के वो,किनारे थे
लहरों के वो,धारे थे
कभी तुम,हमारे थे
कभी हम,तुम्हारे थे
हम दोनों ही,
एक दूसरे को,प्यारे थे
जिंदगी ने, ली करवट
कुछ लम्हे,तन्हाई में
गुजारे थे,
वक्त गुजर गया
वो लम्हे, नहीं
हमारे थे
आज हम उनके हैं
वो हमारे हैं,
वो बहुत प्यारे हैं

आर.डी.वैरागी

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