Friday, 28 April 2017

भारती सोनी

जीर्ण जब करती हृदय की
उलझती चिंतन विथायें,
तब कभी मिथ्या से सच का
साथ दे दूं तो निभेगा?
सुलगती चिंगाररियो से
रतविमुख न हो सके तो,
तब शिथिल नभ नीर से
घिर कर बिखर लू तो बुझेगा?

निरन्तर
😊🙏..... 731

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

अब उषा के गहन मंथन
साँझ के अन्तः  बसे है
संधियों से  प्रखर जैसे
कहे से अनकह रहे है।
   तरुण दिन की थाह कोई
    क्यो भला यूं छल रहे है
    माँजते इस समय को
    विच्छिन्न मन भी पल रहे है 721

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

दृग अनिर्वचनीय से
कैसे तुमने  बांधे प्रियतम,
आँचल के कोरो से
ढकता आनन चंचल
समाधियों की शिला बनी
निश्चल सा अभिनव।
मौन कहाँ तुम  आखर का
हो चिर स्पंदन721

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

मैं परिधि तुम हो अनन्त
मैं सांझ रही तुम प्रथम किरण
मैं मौन भले तुम प्रखर प्रखर
मैं सजल सजल तुम हो मरुथल
जब जतन हुआ  ताना बाना
तुमसे मैं का आना जाना
तुम निर्मोही,मैं रत माया
तुम पल मेरे,
तुम बल मेरे
तुम मन मेरे मैं हूँ काया..722

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯

अनन्त अथाह रही सीमा जो
प्रतिपल निसदिन  स्वयं जी गई।
प्रश्नों के अंबार भले
प्रतिउत्तर  वो आजन्म पी गई।
निश्छल थी नदियों के वेग सी
सहज ही कलकल स्वयं रीत गई।
स्वयं प्रभा के संदेशों सी
अनुच्छेद में  वर्ण  भी  रही।
                ।। 719 ।।

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🎄🕯🎄

""भगौरिया स्वागत "

धुन सुन बांस  की बंसुरिया  भी
गुन धुन राग सुनाने लगी,
रंगों की हे विविध छटा जो
परिधानों  संग आज सजी,
फुलकारी के नित नित छापे
हाथ पाँव श्रंगार हुए,
गालो की लाली भी सजती
होठों का आधार लिए।
ढोल और मांदल की थापे
उल्लसित कर जाय रही,
थिरकन ताड़ी की मदिरा मय
मन आँगन बहकाय रही।
हुंकारी, कुर्राट भरे
गूंजे मदहोशी  हाला में,
धम धम पढ़ते पाँव थाप पर
विजय  प्रेम की  धारा में।
कामायनी रूप की दासी
हर बाला श्रंगारीत है,
मदन बना हर नर  मोहित है
ये उत्सव आभारित है।
भगौरिया की परम्परा ये 
प्रेम स्नेह सम्मान यहाँ
जिसने पाया गर्व हुआ है
ईश्वर का वरदान यहाँ।।

               भारती सोनी

               पदांश  (।। 721।।16/03/16)

प्रार्थनाएं प्रिय होगी- -

स्मृतियों की अनदेखी,
विश्वस्त  क्या भविष्य ,
कैसे कोई मंथन होगा?
विमुख  विस्तृत  शोध,... उफ़
अंतह से कोई प्रश्न होगा ?
ले चलो स्वप्नों  के रथ जो
थाह पाकर  पथ भृमित न हो सके
आश्वस्त होकर साथ से
अंशों से जुड़कर फल सकें।
अब दिशाएं  स्थिर होगी,
राह  भी निर्भीक  होगी
प्रार्थनाएं प्रिय होंगी....
अब तुम्हारी सहजतायें
मेरे पथ की नींव होगी...
प्रार्थनाएं प्रिय होगी...।।।।

          बस अभी..😊🙏
                भारती सोनी

🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄

मैंने  कदर्थ यू बीज नही
बोए, कतिपय विध्वंस के,
कर्हो कहाँ से लहर उठी ये
चिंगारी  -मन्तव्य से?
नही कोई विन्यास रहा
सुविचार प्रीत से पाले थे।,
किसके  आहत हुए स्वप्न
किसकी मुस्कान पे धावे थे।
मुझमें मेरे  कष्ट भाव ,
दक्षिणा मात्र से पाले थे,
अब कोई कितने समदर्शी
कोई  ना सह धारे थे।

भारती सोनी

817🙏

,🕯🕯🕯🕯🕯🕯

चलो की उगलने दो
तिश्न ,तीव्र,तपन की धारा।
आश्रय पराजित नही
मोक्ष अविश्वसनीय नही।
सम्भव है यही प्रकृति प्रसाद है,
मेघो के बरसने से पहले भी इतिहास है।.....

816🙏

फूल सब मुरझा गये  चाहे रजनी भर,
प्रात निश्चित आँगनों में  सम ही होगी।  रीस आँखे  अंजनी  हो आज चाहे
इस धरा पर अश्रु के संग वो सनेगी,
हे प्रथम मन
वो तुम्हारा सच कहेंगी,
व्यथा क्यों कर वो सहेगी।..

.निरन्तर🙏

समय के गति रेख से
जब बढ चले तो चल ही दो मन।
कब तलक परछाइयों में
ज्वलित बाती दमन लेगी ,
धुंध जब उभरेगी ,भानु
समाधानी साथ होगा।
मृग मरीचिका की भांति
हर पहर संसार होगा।
प्रश्न तुल्य ये हिम शिखाएं
उस तपिश के भय करेंगी
जब तुम्हारे धैर्य पग से
ये धरा श्रृंगार लेगी।
ये धरा श्रृंगार लेगी।।796।।

🎄🎄🎄🎄🎄🎄

वो जाग रहा  है अनवरत,
नैपथ्य को धकेलता हुआ
मौन सा है, मगर चिंतन शील।
अतिरिक्त  जय सा है वह,
शून्य आकाश की तरह।
बाधाएं जिसे नहीं जीत पाई,
अनन्त अनन्त अनन्त ओजस से पूर्ण
चेतन और अंतः को नापता वह।
चैतन्य ..
वो जाग रहा है अनवरत..।

*आपको समर्पित "अभी से अभी तक"
        (भारती सोनी 795)

,🎄🎄🎄🎄🎄🎄

            
[21/01, 09:53] Bharati Soni:
हार चाहे जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं.।

          भारती सोनी

[21/01, 11:40]
हार बिना जीत किसे मिली है
जीत तो हार के बिछौने पर पली है।
भय कभी असीम नहीं होता
परिधियों के पार ही जीत मिली है।।

                      रामनारायण सोनी

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