तुम्हे याद हो के न याद हो
मेरी यादों की तरोताजा जमीन पर मौजू है
वो आँगन की लिजलिजी सी मिट्टी,
बनती कभी मरहम दिल का
वो फर्श पर पड़ी धूल पे ताजा पाँव के निशान,
करती बयाँ कि तुम यहीं कहीं हो
वो डायरी के कुछ फड़फड़ाते पन्ने
जिनमें इबारतें तेरे मेरे इश्क की ही हैं
वो रोशनदान से झाँकती मद्दम रोशनी में
अगरबत्ती का धुआँ बनाता नगरकोट
तुम्हे याद हो के न याद हो।।
वो पेशानी पर पड़ी चंद सिलवटें
चूमती गुनगुनी बदन की झुरझुरी
वो शबनमी आखें बोझल पलकों में दबीं
कहती, सुनती, लरजती कुछ कुछ
वो खिड़की पर टिका अनमना खामोश चेहरा
वो इन्तज़ार करती उल्टी भीगी छतरी
फुहारों की फुनगी लगाए खड़ी
वो शाम के धुँधलके से उभरता अक्स
गली पर, मोड़ पर, साँस के दौर पर
दबे पाँव कोई सहमता, गुजरता जाता
तुम्हें याद हो के न याद हो।।
मेरी यादों की तरोताजा जमीन पर मौजू है
तुम्हें याद हो के न याद हो।।
रामनारायण सोनी
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