Tuesday, 25 April 2017

डॉ जय बैरागी


महुआ टपके आम बौराए 
टेसू गाये गीत रे
मेरे मन को तेरी आशा
ओ मेरे मनमीत रे ।।

उजड़ी उजड़ी भरी दुपहरी
शीतल ठण्डी राते है
छोटे सपने पल दो पल के
किन्तु लम्बी बाते है ।।

आधे सपने आधी निंदिया
आधे मन की जीत रे ..

लगे सुहानी पूर्वा मुझको
उल्लसित नव भोर है
कलरव करती हर क्यारी में
अल्हड़पन का शोर है

छु के देखे दर्द पराया
इन नयनों की प्रीत रे ..
मेरे मन को तेरी आशा
ओ मेरे मनमीत रे


🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄


तुम मुझे फिर याद आये  ।। 

थी कुहाँसे की बदरियाँ रात भी काली घनेरी ।
दामिनी की गर्जनामय घर्षणा मय भोर भेरी ।

अश्रुओं की अर्चना में नयन पत्थर  हो चले है 
औऱ उपवन वन झरोखे आज  पतझर हो चले है ।

जब कोई पदचाप आहट कर्ण में आकर बसी है 
याद अपने नीड़ से निकली व्यथा में अब धंसी है ।

नीर की नीरव निशा में दीप बस पथ का अकेला 
है खड़ा अब भी लगाए आस का विश्वास मेला ।

बस खड़ी दिग्भ्रान्त राहे अंत ओर अनन्त पथ की
गिन नही पाए है तीली  वक्त के इस काल रथ की ।

श्लोक जीवन के स्वयंभू आप ही बनते पुरोहित 
वक्त की बुनियाद के अब प्रश्न सारे ही तिरोहित 

भोर की लाली अचानक सांध्य की ललना हुई है 
वक़्त छलिया ओर नियति  अब लगा छलना हुई है ।

जब कोई गुंजन सुनी तो स्वर लगा मुझको तुम्हारा
हर घड़ी पलटा लगा कि हो न हो तुमने पुकारा 

भेद के बहके प्रभेदों में कमी छलकी सदा ही 
ओर जीवन की कथाएँ  बस रही हलकी सदा ही

आज जीवन की कथा में गहन इक सन्यास पाया 
ओर तुमको इस कथा में भी स्वयम के पास पाया ।


नील के इस व्योम तन पर 
बस समय के मेघ छाये 
तुम मुझे फिर याद आए ।

जय वैरागी 

18 सितम्बर 17

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄


1. अग्नि-स्तवन
पर्व ज्वाला का, नहीं वरदान की वेला ! 
न चन्दन फूल की वेला ! 

चमत्कृत हो न चमकीला 
किसी का रूप निरखेगा, 
निठुर होकर उसे अंगार पर 
सौ बार परखेगा 
खरे की खोज है इसको, नहीं यह क्षार से खेला ! 

किरण ने तिमिर से माँगा 
उतरने का सहारा कब ? अकेले दीप ने जलते समय 
किसको पुकारा कब ? 
किसी भी अग्निपंथी को न भाता शब्द का मेला ! 

किसी लौ का कभी सन्देश 
या आहूवान आता है ? 
शलभ को दूर रहना ज्योति से 
पल-भर न भाता है ! 
चुनौती का करेगा क्या, न जिसने ताप को झेला ! 

खरे इस तत्व से लौ का 
कभी टूटा नहीं नाता 
अबोला, मौन भाषाहीन 
जलकर एक हो जाता ! 
मिलन-बिछुड़न कहाँ इसमें, न यह प्रतिदान की वेला ! 

सभी का देवता है एक 
जिसके भक्त हैं अनगिन, 
मगर इस अग्नि-प्रतिमा में 
सभी अंगार जाते बन ! 
इसी में हर उपासक को मिला अद्वैत अलबेला ! 

न यह वरदान की वेला 
न चन्दन फूल का मेला ! 
पर्व ज्वाला का, न यह वरदान की वेला।
 2. पूछो न प्रात की बात आज-गीत
पूछो न प्रात की बात आज 
आँधी की राह चलो। 

जाते रवि ने फिर देखा क्या भर चितवन में ? 
मुख-छबि बिंबित हुई कणों के हर दर्पण में ! 
दिन बनने के लिए तिमिर को 
भरकर अंक जलो ! 

ताप बिना खण्डों का मिल पाना अनहोना, 
बिना अग्नि के जुड़ा न लोहा-माटी-सोना। 
ले टूटे संकल्प-स्वप्न उर- 
ज्वाला में पिघलो ! 

तुमने लेकर तिमिर-भार क्या अपने काँधे, 
तट पर बाँधी तरी, चरण तरिणी से बाँधे ? 
कड़ियाँ शत-शत गलें स्वयं 
अंगारों पर बिछलो। 

रोम-रोम में वासन्ती तरुणाई झाँकी, 
तुमने देखी नहीं मरण की वह छवि बाँकी ! 
तिमिर-पर्व में गलो अजर 
नूतन से आज ढलो ! 
आज आँधी के साथ चलो !


🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄


यह व्यथा की रात का कैसा सवेरा है?
ज्योति-शर से पूर्व का
रीता अभी तूणीर भी है,
कुहर-पंखों से क्षितिज
रूँधे विभा का तीर भी है,
क्यों लिया फिर श्रांत तारों ने बसेरा है ?
छंद-रचना-सी गगन की
रंगमय उमड़े नहीं घन,
विहग-सरगम में न सुन
पड़ता दिवस के यान का स्वन,
पंक-सा रथचक्र से लिपटा अँधेरा है ।
रोकती पथ में पगों को
साँस की जंजीर दुहरी,
जागरण के द्वार पर
सपने बने निस्पृह प्रहरी,
नयन पर सूने क्षणों का अचल घेरा है ।
दीप को अब दूँ विदा, या
आज इसमें स्नेह ढालूँ ?
दूँ बुझा, या ओट में रख
दग्ध बाती को सँभालूँ ?
किरण-पथ पर क्यों अकेला दीप मेरा है ?
यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है?


🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄


व्योम की अभिव्यंजना में 
फिर घने पर्जन्य छाये 

आस रीती  प्यास रीती
अब धरा की साँस रीती


कण्ठ सूखे गीत सुखे 
प्राण के मन मीत रुँखे

प्राण आकुल धरा व्याकुल 
संकटो में घिर रहा कुल 
पाप ऊँचा ताप ऊँचा
पीर का हर जाप ऊँचा 

ताल सूने नाल सूने 
पोखरों के भाल सूने 

एक पग की एक खग की
याचनाऍ आज जग की

धार की या हार की है
मेघ के मल्हार की है

प्रश्न जब प्यासा रहा है
ये सदा आशा रहा है 

याचिका स्वीकार घन को
मेघ के नव घने साये 

26 जून  17े


🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄


गल रही कमनीयताए
अर्चना के इन क्षणों में ।


प्रार्थना मय मुग्धता दृढ़ पाश मन की रिक्तियों के 
है उंकेरे चित्र मन की भंगिमा मय भित्तियों के 
दीप की बाती जलाना कर्म की सद अर्चना है 
और पग नूतन बढ़ाना ध्येय  की नव सर्जना है 

बन्द पलको में जला दीपक नयन को धारता है 
रोग तन की वासना के नित्य जल कर मारता
है 

ध्यान की गहराइयों में देह की करुणा समायी 
और घट का नाप लेने रश्मियाँ बिंदु में आयी

देह नश्वर मिट चली है पाप है निर्मूल जड़ से 
प्रज्ज्वलित सब राग चेतन जुड़ गया ज्यो शीश धड़ से 

विश्व की अभ्युथना  अब स्वार में अनुस्वार लेकर
अर्चना में ही छटा जो लब्धता का भार लेकर ै
सप्त सागर उमड़ कर अब वाष्प में ढलने लगे है
मेघ जो भी थे गरल परमार्थ में गलने है ं

अंक में सृष्टि समाई उर में थे ईश निर्झर 
बह चली करुणा प्रकम्पित अश्रु की बस धार झर झर

भक्ति की रस धार की फुहार से मन जागता है 
सत्य से संवाद करके तिमिर तन का भागता है   

इंद्रीय निग्रह होना ये सरल उपचार है क्या
और दमन की वेदना की ये अधूरी हार है क्या
 
जल रही सारी शिराएँ  
वन्दना के इन कणो में ै

22 जून



🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄



यह दीवस की सांध्य बेला 
और मै बिलकुल अकेला
रौशनी को पी रहा हूँ 
जाने कैसे जी रहा हूँ ।।


नीतिया निर्वाह करके 
देह व्रण से भर गयी
नेकियों की पाठशाला
अपने अपने घर गयी

नेह और विश्वाश  का
नीलाम अब व्यापार है
लूट रहे है मित्र थे जो 
मन के सब संस्कार है 

पुष्प सारे शूल बनकर 
वेदना को सी रहा हूँ
जाने कैसे जी रहा हूँ

: है क्षणिक अब शेष् 
दो पल का उजाला है 
कैसे मानु के नही 
जीवन ये काला है 

अब नही है शेष शक्ति
हार  बैठा      मन
जो भी नश्वर  है उसी को
कहते है   हम   तन

में तो जलते दीप का 
बस घी रहा हूँ
जाने कैसे जी रहा हूँ



🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄


पेटों में अन्न नहीं भूख
साहस के होठ गए सूख
खेतों के कोश हुए रीते
जीवन की रात कहाँ बीते?

माटी के पाँव फटे
तरुवर के वस्त्र
छीन लिए सूखे ने
फ़सलों के शस्त्र
हाय भूख-डायन को
आज़ कौन जीते?

हड्डी की ठठरी में
उलझी है साँस
मुट्ठी भर भूख और
अंजलि भर प्यास
बीता हर दिन युग-सा
जीवन-विष पीते।

हृदयों के कार्यालय
आज हुए बंद
और न अब ड्यूटी का
तन ही पाबंद 
साँसों की फा़इल पर
बँधे लाल फी़ते।



यह दीवस की सांध्य बेला 
और मै बिलकुल अकेला
रौशनी को पी रहा हूँ 
जाने कैसे जी रहा हूँ ।।


नीतिया निर्वाह करके 
देह व्रण से भर गयी
नेकियों की पाठशाला
अपने अपने घर गयी

नेह और विश्वाश  का
नीलाम अब व्यापार है
लूट रहे है मित्र थे जो 
मन के सब संस्कार है 

पुष्प सारे शूल बनकर 
वेदना को सी रहा हूँ
जाने कैसे जी रहा हूँ

: है क्षणिक अब शेष् 
दो पल का उजाला है 
कैसे मानु के नही 
जीवन ये काला है 

अब नही है शेष शक्ति
हार  बैठा      मन
जो भी नश्वर  है उसी को
कहते है   हम   तन

में तो जलते दीप का 
बस घी रहा हूँ
जाने कैसे जी रहा हूँ


🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄


लौट आ रे !
ओ प्रवासी जल !
फिर से लौट आ !

रह गया है प्रण मन में
रेत, केवल रेत जलता
खो गई है हर लहर की
मौन लहराती तरलता
कह रहा है चीख कर मरुथल
फिर से लौट आ रे!

लौट आ रे !
ओ प्रवासी जल !
फिर से लौट आ !

सिंधु सूखे, नदी सूखी
झील सूखी, ताल सूखे
नाव, ये पतवार सूखे
पाल सूखे, जाल सूखे
सूखने अब लग गए उत्पल,
फिर से लौट आ रे !

लौट आ रे !
ओ प्रवासी जल !
फिर से लौट आ !

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄



मौन मेरा वीथियों में जब तलक पलता रहा 
आदमी दे दंश विष के रात दिन छलता रहा 

मै हिमालय के शिखर का एक छोटा भाग हूँ
आग ले कर जो ह्रदय में उम्र भर गलता रहा 

सारथि मुझको बना ले मंज़िलो का हम सफर
राज़दाँ मेरा जहाँ में उम्र सा ढ़लता रहा 

चन्द्र तारो की हमेंशा बात तुम करते रहे
पाँव मेरा ग्रीष्म की धरती तले जलता रहा

वक्त बस परछाइयां थी मुठियो में कब रही
मुठिया ख़ाली रही और हाथ मै मलता रहा


🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄



खो गए है मूल्य के वे छंद  पाना चाहता हूँ 
साथ कोई हो न हो पर गुनगुनाना चाहता हूँ ।

एक साथी जलजला है एक है उठता धुआं
है भयानक खण्दको में पाँव के नीचे कुआँ 
बिच पथ ऐसी डगर जो डगमगाती है सदा 
उलझनों के दँश में बस विष पाती है  सदा 

इस भरम को तोड़  कर
उस पार  जो ले जाएगा सत्य केवल एक वो ही हमसफ़र कहलाएगा  ।।

तोड़ कर सब बन्धनाए
पार पाना चहता हूँ

2003

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄



जीवन बीत गया ।।

कुछ आंसू में कुछ आहों में
कुछ मन की सिमटी चाहो में 
कुछ पनघट प्यासी राहो में
कुछ तन की मन की बाँहों में ।।
कुछ पाने की अभिलाषा में
कुछ डर कर ठहरी आशा में
कुछ बोलीं में कुछ भाषा में 
कुछ ढपली में कुछ ताशा में

कुछ गम्भीरता कुछ अल्हड़पन
कुछ मरुथल है  कुछ कानन
कुछ यादो का सिसका उपवन
कुछ जागे कुछ सोये तन मन 

पनघट से भर कर आया जल

     सारा रीत गया ।
     जीवन बीत गया 

कुछ सपने आँखों में आधे
कुछ सपने ऊँचे कुछ सादे 
कुछ है चीर स्म्रति यादें
झंकृत उर में कैसे वादे

कुछ वचनो के खेल निराले
कुछ के वचन उम्र भर काले 
कुछ झुरमुट के क्षणिक उजाले
अब सोचे जाने क्यू पाले

चिंतन मरघट आहे ठण्डी
चौड़े पथ अब है पगडण्डी
छाया तरुवर सारे दण्डी
जीवन बस सांसो की मण्डी ।।

   जितना मोल चुकाया हमने 
    उतना जीत गया


🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄


जीवन के इस निर्गम पथ का
मै बंजारा मै बैरागी।।

ना मैं सुख हूँ ना मैं दुःख हूँ
ना मैं जन्म मरण का लेखा 
ना मैं नश्वर ना अविनाशी 
मै बस दुर्बल देह सी रेखा।।

ना मै भीतर ना मै बाहर
मै स्थापित अपने घट में 
सातो सागर बसते मुझमे
पर मै राधा के पनघट में।।

अंत नही प्रारम्भ नही  हूँ
ना मै जागा ना ही सोया
पलक खुली देखी मुख मुद्रा
ना हँस पाया ना मै रोया।।

आधे सच को भोग रहा हूँ
मै मन वचन कर्म अनुरागी
जीवन के इस निर्गम पथ का 
मैं बंजारा मैं बैरागी।।

ना मैं कर्ता कर्म नही मैं
ना मैं पापी ना पुण्यायी
सब कुछ तय नियति का लेखा
क्या फिर स्वर्ग नर्क की खाई।।

ना मैं आधा ना मैें पूरा 
साधन क्या जो मुझको नापे 
ना मैं अक्षर ना मैं वाणी
मन्त्र नही हूँ जो कोई जापे।।

भोर नही हूँ ना मैं तम हूँ
ना ही मैं सन्ध्या की लाली
जाने कितनी पाल रखी है 
पर इस तन ने राते काली।।

क्यूँ तन के विस्तारण में फिर 
मन की कोई इच्छा जागी 
जीवन के इस निर्गम पथ का 
मै बंजारा मै बैरागी।।


🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄


वक़्त की गहराइयां खामोश है ।।

छाँव में जलती चिताओ का रुदन 
धूप में लेटी हवाओ की चुभन 
आँख से बेबस हुए मोती लिए 
चुप रही हर स्वप्न माला की टूटन 

देखती नव रूप  की दृश्यावली
है किसी का या स्वयं का दोष है  ।


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बहती रस की धारा लिख
या खुद को बंजारा लिख

देह पसीना स्याही तन की
ऐसा कोई    नारा लिख 
कदम कदम कांटो के  कानन
नागफनी का सारा लिख
दुश्मन से जीता है माना
पर अपनों से हारा लिख
खट्टे मीठे स्वाद मिले पर 
रिश्ता कोई खारा लिख
उपवन उपवन पाँव जले क्यू
फूल छुपा अंगारा लिख 

कहने को बेशक कड़वा मैं
तू बस मीठा पारा लिख


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"दीप आँगन में जलाओ"


सांध्य निर्वासित खड़ी है
दीप आँगन में जलाओ ।

श्रृंखला के क्रम अभी
निर्बाध उपक्रम में सजे है
पुंज है लघु  रूप लेकिन
सूर्य इनको कब तजे है ।

रश्मियाँ अवसान लेकर भी परिमित जागती है 
दीप की लघु रेख में विभा गहन हो भागती है ।

निखळ की नीरव निशा से कौन ये लड़ती निरन्तर
सूर्य के  पदचाप थामे क्षणिक ले कर ताप अंतर ।

जो उजालो से परे हों  पथिक् :- उनका  आसरा हो 
दीप की इस ज्योत ने  जब रूप   दृष्टा का धरा हो ।

रात ये गहरी बड़ी  है 
जोति को बस तुम जगाओ



8 मई 2017


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तेरे मन्दिर का हूँ दीपक जल रहा 
आग जीवन में मैं भर कर जल रहा, 
जल रहा तेरे मन्दिर का हूँ दीपक जल रहा 
क्या तू मेरे दर्द् से अन्जान है 
तेरी मेरी क्या नयी पहचान है 
जो बिना पानी बताशा ढल रहा 
आग जीवन में मैं भर कर ... 
इक झलक मुझ को दिखा दे साँवरे, साँवरे मुझ को ले चल तू गधुम की छाँव रे, 
साँवरे और छलिया आ आ आ और छलिया क्यों मुझे तू छल रहा आग जीवन में मैं भर कर ...
 मैं पथिक मद बाँसुरी के बाँछता 
एक धुन पर
 सौ तरह से नाचता आँख से जमुना का पानी
झर  रहा
आग जीवन में मैं भर कर ...


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इक कहानी उम्र की

उम्र का यह कौन सा अहसास है 
ज़िन्दगी  के गीत में सन्यास है ।

धड़कनो के राग मद्धम हो गए 
कामना के तार सरगम हो गए
पाँव पसरी  भावनाए अनकही
लोचनो के दृश्य हमदम हो गए 

बस बदलती करवटों में उंघकर 
रितता  ही जा रहा  विश्वास है ।।

खिलखिलाती धुप है पर शाम की
इक कहानी उम्र की एक नाम की 
किस  समय का ओढ घूंघट पांव की 
राह पगडण्डी  हुई बेनाम की 

पीर के अक्षर किताबो ने लिखे 
बन रहा नूतन घड़ी इतिहास है ।।

धूप में हैं छाह की सी झाईयां
खग विहग की घट रही ऊचाईयां 
श्वास के कम्पन  निरन्तर बढ रहे  
बढ़  रही कद की कही ऊंचाइयां 

धार बन कर बस समय सी बह रही ।
उम्र की सीमा समय की  दास है ।।

1 अगस्त 10 


पुनः प्रेषितटी

    
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"क्षितिज मैं था"

मै सुमन था चमन तुम थी
लक्ष्य। था मै लगन तुम थी 
दायरे कुछ भी रहे हो 
दीप था मै अगन तुम थी ।।

शून्य का आधार क्या है
और हवा का  भार क्या है 
आओ मिल कर माप ले सच
क्षितिज में था गगन तुम थी

धर्म में अवधान भी है
कर्म में व्यवधान भी है
ज़िन्दगानि के समर मे
मेरे संग संग मगन तुम थी ।।


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    छंद मिले पतझर में 

जिस उपवन को छोड़ गए तुम माली हाथो ,
उसका अब दायित्व निभाना धर्म है मेरा 

सोचो झंझाओ ने कितने प्रलय मचाए 
कितने आंधी अंधड़ नित नव नृत्य नचाए 

नव अंकुर कोपल झुलसे जेठी धूपो में 
हरियाली के छंद मिले पतझर रूपों  में 

नमी नयन अनीमेष निरन्तर अब पाताली
छिनी सुमन अधर से आखिर किसने डाली 

दूब घास बन ग्रास शूल पण बिछी बिछौना 
अरमानो की सेज लगी मरघट का रोना 

सींचो तुम कानन कितने मधुमास घटा ले 
बीते इस उपवन में आना कर्म है मेरा ।


5 मई 2017






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मैं हूँ व्यथा का बोझ सखी तू
फुलवारी कोमल उपवन की
में बोली चट्टानों जैसी
तू भाषा गिरते सावन की ।

में लघु की हूँ जटिल बनावट 
तू वृहद का सीधापन है
पोलापन हूँ मै अम्बर का
तू धरती का स्वर्णिम कण है

मै दिक् भ्रांत अनन्त प्रिये तू 
वसुधा है अमृत मन्थन की ।।

मै अक्षर बिखरा बिखरा सा
शब्द कोष तू सुख साग़र का
तू उर्मि सिंधु जीवन की 
मै जल सिमटा हूँ गागर का

आदिम युग सी लिपि  मेरी
और लिपि तू मलय नयन की
।।

मै अंधियारा गहन विभा का 
तू उगते सूरज की लाली
मै विषाद कलुषित जीवन का
तू उज्ज्वल शुचिता शेफ़ाली 

मै प्रकाश का भेद अलि तू दिव्य ज्योति है 
अंतर्मन की
मै बोली चट्टानों जैसी
तू भाषा गिरते सावन की ।।

कवि
डॉ जय बैरागी


कर्म भी है त्याग भी है ज़िन्दगी
रागिनी मय राग भी है ज़िन्दगी
क्या हुआ मलमास की छाया मिली 
उत्सवो में फ़ाग भी है ज़िन्दगी ।।

ज़िन्दगी भारी भी है हल्की भी है 
बन्ध गयी है पर कही छलकी भी है 
ज़िन्दगी तो बुद्ध का मूल रूप  है
ज़िन्दगी अवतार में कल्कि भी है

यह सांध्य की लाली भी है 
ज़िन्दगी मावस घनी काली भी है 
ज़िन्दगी यह भोर की उषा किरण 
ज़िन्दगी हमने अगर पाली भी है

मूल्य के निष्प्राण शव सी जिंदगी
रीतियों के रति -रव सी ज़िन्दगी
कौन पाया आंक जाकर तलहटी
सीप की सिहरी प्रसव सी ज़िन्दगी

उपवनों में तितलियों सी ज़िन्दगी
मेघ कुल में बिजलियों सी ज़िन्दगी 
ब्रह्म के मण्डप सजे श्रंगार में
नाचती है पुतलियो सी ज़िन्दगी

🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄


कवि का सयाना शैशव--

अतीत का अप्रतिम वैभव, 
कवित्व का इठलाता शैशव,
भाल पर उदित हुई अरुणाई
जागी अब कवि की तरुणाई
                       संपादक (रामनारायण सोनी)

"उदास होता है वक़्त रोता है हर पहर
टूटता है दिल पर यादो का जब कहर

पूछती नदी गुमसुम सिसकती पहाड़ो से 
क्यू लगता है उजड़ा सा सपनो का यह शहर

मीठे स्पर्श में छलकता परायापन कैसा
गुलाबो में रहने लगा है छुप छुप कर अब जहर"

2

शब्द ह्रदय की अभिव्यक्ति में बहता एक अनुप्रास है 
कोई रचना दूर ह्रदय से कोई उर के पास है ।

सम्बन्धो और अनुबन्धो में जीवन सारा पीस गया 
भावो के धागों में लिपटा फिर भी यह विश्वास है  ।

मन के द्वारे घने अँधेरे शब्द जगत की हार ये 
कही दिगम्बर खड़ी अहिंसा कही बुद्ध उपवास है ।

यौवन के कुछ् सपने टूटे कुछ आँखे भी है पथरायी
स्वप्न रह गए थे जो कोरे वो कल का इतिहास  है।

3

मैं हूँ व्यथा का बोझ सखी तू
फुलवारी कोमल उपवन की
में बोली चट्टानों जैसी
तू भाषा गिरते सावन की ।

में लघु की हूँ जटिल बनावट 
तू वृहद का सीधापन है
पोलापन हूँ मै अम्बर का
तू धरती का स्वर्णिम कण है

मै दिक् भ्रांत अनन्त प्रिये तू 
वसुधा है अमृत मन्थन की ।।

मै अक्षर बिखरा बिखरा सा
शब्द कोष तू सुख साग़र का
तू उर्मि सिंधु जीवन की 
मै जल सिमटा हूँ गागर का

आदिम युग सी लिपि  मेरी
और लिपि तू मलय नयन की
।।

मै अंधियारा गहन विभा का 
तू उगते सूरज की लाली
मै विषाद कलुषित जीवन का
तू उज्ज्वल शुचिता शेफ़ाली 

मै प्रकाश का भेद अलि तू दिव्य ज्योति है 
अंतर्मन की
मै बोली चट्टानों जैसी
तू भाषा गिरते सावन की ।।

🌠 डॉ जय वैरागी
🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉


हो सके तो ज़िन्दगी अब तो गले लगा ।।

नाकामियो के जगलो में कितने शूल है
माना कि थोड़ी मेरी तेरी भी तो भूल है

जो बीज हाथ में थे उन्हें बो रहा था मै
जागी हुई इस नींद में बस सो रहा था मै

धुंद थी कुछ धुंद का गहरा उजाला था
रौशनी को किस जतन से मेने पाला था

हर चमक ने खुद को दिवाकर बना लिया
और हमनें अपने आँगना उनको सजा लिया ।।

जाने कहाँ थी मंजिले छाले छलक पड़े 
बिन नयन सुनी  आस के आँसू ढलक पड़े ।

भटके हुए इस पांव को चोटे भले लगा
हो सके तो ज़िन्दगी अब तो गले लगा ।।

डॉ जय वैरागी
21 अप्रैल 16

🎫🕯🕯🕯🕯

वक़्त को पढ़ती रही है ज़िन्दगी
अर्थ को गढ़ती रही है ज़िन्दगी
कांच की टूटी हुई बारीकियां
हीरे सी जड़ती रही है ज़िन्दगी

जन्मना एक तथ्य है यह ज़िन्दगी
आचरण का पत्थ्य है यह ज़िन्दगी
है उपन्यासों की लघुता सार बन
हर कथानक कत्थ्य है यह ज़िन्दगी
[
धूप में जितना खिली है ज़िन्दगी
स्वेद से उतनी गीली  है ज़िन्दगी
दूर मेहनत से कभी जब भी हुई 
दूर पथ रोती मिली है ज़िन्दगी

📚📚📙📘📓📗📙

आँख का पर्दा गिरा तो बन्धनाएं हँस पड़ी 
मूल्य की बाते हुई तो वर्जनाएँ हँस पड़ी 
हँस पड़ा था नयन का पानी मिला जो धूल से 
रूठ क टूटी  हुई   सब  सर्जनाए हँस पड़ी

🎄🍗🎄🍗🎄🍗🎻🐦


पलट कर जिंदगानी ये मुझे अब भी बुलाती है
पलट कर जब कभी देखा तुम्हारी याद आती है ।।

व्ही झूले वही सावन वही अमराई का मौसम 
सदाए कूक कोयल की मुझे अब भी सुनाती है

वही फागुन वही पतझर वही सरसो की आवाज़े
तुम्हारे कंठ से निकला हुआ संगीत गाती है 

अँधेरा लीलता है  जब उजालो की हकीकत को
तुम्हारी प्रीत राहो में सदा दीपक जलाती है

ऋचाएँ गूंजती नभ्  में विरासत वेद की लेकर
अंधेरो के पतन पर भोर की बेला सुहाती है 

वही चेहरा वही मंजर वही वही वादी वही घाटी
दिखा के आइना सच का अभी भी मुस्कराती है

न तुम सोचो न मै सोचूँ गया जो पल अतीति है
पुराने अनछुए पल से  ये आँखे डबडबाती है 

परीक्षण की कसओटीें पर वफ़ा को तोलने से क्या
वफ़ाए वक़्त की रफ़्तार में खुद को छुपाती है

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धुन्ध का बेबस उजाला ज़िन्दगी 
दीप बाती, तेल काला ज़िन्दगी 
ज्योत्स्ना के नाम पर बैठी रही 
चिर प्रतीक्षा कण्ठ हाला ज़िन्दगी।

💐💐💐💐💐💐

किस मोड़ से तुझे पुकारू  ऐ  ज़िन्दगी !
कि हर मोड़ पर शिकस्त खाई है 
तुझसे मिलने की चाहत में
आँखे मेरी पथराई है  ।
कदमो ने रुक रुक कर  देखा कई बार मगर
सड़क कही भी फूलो की
नज़र नही आई है

🎻🎄🎻🎄🎻🎄

जय वैरागी: 
कर्म भी है त्याग भी है ज़िन्दगी
रागिनी मय राग भी है ज़िन्दगी
क्या हुआ मलमास की छाया मिली 
उत्सवो में फ़ाग भी है ज़िन्दगी ।।

ज़िन्दगी भारी भी है हल्की भी है 
बन्ध गयी है पर कही छलकी भी है 
ज़िन्दगी तो बुद्ध का मूल रूप  है
ज़िन्दगी अवतार में कल्कि भी है

ज़िन्दगी यह सांध्य की लाली भी है 
ज़िन्दगी मावस घनी काली भी है 
ज़िन्दगी यह भोर की उषा किरण 
ज़िन्दगी हमने अगर पाली भी है

मूल्य के निष्प्राण शव सी जिंदगी
रीतियों के रति-रव सी ज़िन्दगी
कौन पाया आंक जाकर तलहटी
सीप की सिहरी प्रसव सी ज़िन्दगी

उपवनों में तितलियों सी ज़िन्दगी
मेघ कुल में बिजलियों सी ज़िन्दगी 
ब्रह्म के मण्डप सजे श्रंगार में
नाचती है पुतलियो सी ज़िन्दगी

🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆

वक़्त को पढ़ती रही है ज़िन्दगी
अर्थ को गढ़ती रही है ज़िन्दगी
कांच की टूटी हुई बारीकियां
हीरे सी जड़ती रही है ज़िन्दगी

जन्मना एक तथ्य है यह ज़िन्दगी
आचरण का पत्थ्य है यह ज़िन्दगी
है उपन्यासों की लघुता सार बन
हर कथानक कत्थ्य है यह ज़िन्दगी

धूप में जितना खिली है ज़िन्दगी
स्वेद से उतनी गीली  है ज़िन्दगी
दूर मेहनत से कभी जब भी हुई 
दूर पथ रोती मिली है ज़िन्दगी


🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯



धड़कन में अनजाना संगीत

हवा हुए दिनमान सब रात बनी इतिहास
चुरा लिए है वक़्त ने जीवन  के मधुमास ।।

अर्थी सपनो की सजी बिखरे रंग  गुलाल  ।
चन्दन माथे का रहा खुशियो से कंगाल ।।

फसलो के आरोप है मूक मौन सब खेत ।
नदियां गरमी की कहे पानी पी गयी रेत ।।

मानव धड़कन में रहा अनजाना संगीत
पत्थर से होने लगी अब अपनों की प्रीत  ।।

परिचय पत्थर हो गया पत्थर पत्थर गाँव 
स्मृतियों से पूछती अब मेड़ों  की छाँव

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ये है वसंत ।
आखो में कजरा
हाथों में गज रा
होठों पे  लाली
गालो ने पाली
हिना का हाथ
संग है कंत
ये है  वसंत ।1।

गेहूं की बाली
चने की डाली
महुआ की गंध
फैली सुगंध
बहती बयार
कोई न अंत
ये है वसंत ।2।
कोयल की कूक
तोते की भूख
चातक  की चाह
जैसे राधा राह
ओवन का सिगार
कोई न पंतऑ
ये है वसंत ।3।
आम के पेड,
गंध सराबोर
पलास  की लाली
उपवन ने पाली
कनक में चमक
कोई न भंत ।
ये है वसंत ।4 ।


pd रायपुरीया जी

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