Friday, 28 April 2017

माधुरी सोनी

सींचते सींचते

अनगिनत फूल खिले आज सुंदर बगिया में
बहारों के मौसम में
वीराना तुम कर गए
सींचते सींचते
व्यथित मन में चिता जल रही
जिसे कह रहे ,सब देखो होली
आँखें लाल स्याह हो रही ,
बह गए आँसू बनकर ,
लहू की रोली
रिसते रिसते

आगे आगे में चल पड़ा ,
पीछे तुम्हारी अर्थी
वो रंग भरे दिवस
और रँगीली तेरी प्रीति
बदरंग हो गया ,
व्यथित मन
पसीजते पसीजते ...

रो देता हूँ अक्सर ,
जब अक्स तेरा दीखता है
दर्द भरे चेहरे में ,
खामोश वक्त
जब छुपता नहीं है
बदल गया सब कुछ ,
जीवन की डस सुन्दर सी बगीया में
वक्त भी , तू भी, शायद  मैं भी
बदलते बदलते ......

माधुरी सोनी

No comments:

Post a Comment