सम्माननीय जी,
सादर-नमन।
हास-परिहास की दृष्टि से ये यह रचना:-
कितनी भी हो दुरी,
कितना भी हो गे प
बातचीत में सहयोगी
देखो ये व्हाट्सऐप ।
हो प्रसन्न लिखते रचना
अच्छी टिप्पणी की चाह में
मचल उठते हम तो
लिखी टिप्पणी वाह में ।
किन्तु,
टिप्पणी करने से भी
करते है परहेज
इति श्री कर लेते है
टिप्पणी के बदले
चित्रो को भेज ,
यही चित्र तो झटका देते है
क्योकि
ये टिप्पणी के रूप में
अंगूठा दिखा देते है।
पूछ लिया जब हमने उनसे,
अंगूठा क्यों दिखाया ,
कुछ ना बोले वे,तत्काल
हाथ जोड़ता चित्र भिजवाया
विशेषज्ञो से पूछा जब,
तब वे बोले,
व्हाट्सऐप पर अनेक ग्रुप
सबके साथ मित्र।
तुम्हारा माथा फोड़ता है,
किसको किसको दे जवाब,
इसीलिये,
सबके हाथ जोड़ता है,
दिखा दिया अंगूठा तो
क्यों खाते हो झेंप,
बातचीत में सहयोगी
देखो ये व्हाट्स एप ,
इसी लिए उपमन्यु,
अब ये कर लेता है
टिप्पणी करने के बदले
अंगूठा दिखा देता है ।
सुनील चौरे "उपमन्यु"
खंडवा
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