Friday, 28 April 2017

विकास

🌹🌹🌹🌹)

जय जी की कविता के विस्तार में---

गा रही ये रागिनी
प्रीत का ये बन्ध है
बह रहा मल्हार है
सावनो की धार है।

धधक धधक ये आग है
पर्वतो के वक्ष पर
शिल्प का प्रहार है
मौन का ये नाद है
शोर का सम्वाद है

घुमड़ रही घटा सी ये
सावन का आगाज है
प्रीत है ये अनमनी
धड़कनो का साज है

टूट रहे तट बन्ध है
विद्रोह की आवाज है
उन्माद की ये रागिनी
विजय का उल्लास है

चमक रही ये बिजलियां
आने को हैं आंधीयाँ
सत्य का सैलाब है
क्रांति का ये नाद है

            विकास

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