Thursday, 27 April 2017

यह अरुणोदय है- डॉ जय वैरागी

कौन हूँ मैं !! ै
जो कभी
प्राची की स्वर्णमय मुस्कान में
उद्दीप्तनओ को चीर
झांक लेता  हूँ
गहन तिमिर की अँधेरी
वृत्त परिधियों से किनारा कर
और तुम्हारे निमित्त
यह अरुणोदय  है
-सुर्ख /लाल /रक्तिम

पर कभी जान पाये
अरुणोदय
कितना विषपान करता है
तुम्हारी लालिमा के लिए ।।

कभी सोचता हूँ
कौन हूँ मै !
दोपहर का सूर्य
जो निखिल सृष्टि की 
समस्त नमी को शोषित  कर
स्वयं के साथ
जाज्वल्यमान रखता हूँ
वीतरागी वैराग्य
ताकि भस्म हो सके
विषाक्तता  ओषधी से ।

निस्पृह गुंजित वातायन में ढलते हुए नीड़ सा
मै ही तो
गुनगुनाता हूँ
विहग के सुर स्वरों  में क्षितज़ की मेड पर
हाथों  में  मेहँदी की लाली लिए 
लजीली दुल्हन  बन

मै ही हूँ जो
नीरव निसब्द रात्रि में
निहन्ता निशांत व्योम में
निकल आता हूँ
असंख्य तारों सा
जीवन के विविध् रूपों सा
4/4/17

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