जेब मे पैसा हे पर बाजार मे दुध नहीं!
खेत में पेदा होते तिजोरी से निकलते अमरुद नहीं!
बंद बोतल मे केद पानी की किमत 20 रु बोटल!
सच तो ये हे भाई पानी तो बरसाते बादल!
तपती धुप मे लहूं को पिंघला बहाकर पसीना जो फसल उगाई जाती!
खाद 'बीज 'दवाई' कटाई सारे खर्च को वहन करते हम ऐक किलो गेंहू की किमत चोदह रु आती!
जो चुनाव के वक्त किसान को भगवान मानते वही जितकर उसके शोषण करते प्रयास!
अरे हम तो ईन्सान हे ये रामको दे सकते धोखा ये सुविधा भोगते ऐशी मे राम को टाट के निचे वनवास!
किसान अपना हक अपनी मेहनत का प्रतिफल मांग रहा सियासी लोगो वो तुम्हारी तरह नहीं शोषित लुटेरा हे!
जुगनुओं मतदो सुरज को गाली बिना सुरज के होता नहीं अंधकार का हरण आता नहीं सवेरा हे
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
दो मुठ्ठी चांवल लेकर चले सुदामा अपने संग!
फर्ज अपना निभाओ पत्नी करती रोज उन्हे तंग!
त्रिलोकी के नाथ सखा तुम्हारे उनको बचपन की प्रित याद दिलाओ!
दो दिन से भूखे बच्चे सोये मांगना अधिकार हमारा ये प्रभू को समजाओ!
बोले सुदामा बचपन का सखा मेरा मोहे मांगत आवे लाज!
मे मांगू तो छोडदे मेरी खातिर अपने तक्तोताज!
जिद पत्नी की मानकर चले सुदामा द्वारिकानाथ के द्वार!
रोका द्वारपाल ने कोन हो तुम भिखमंगो को अंदर जाने का नहीं अधिकार!
बोले सुदामा मे सखा कन्हैया का मत रोको मुजको तुम द्वारपाल!
जाकर कहो उन्हें आया सुदामा तुमसे मिलने सुनकर दोडा आयेगा नंदलाल!
द्वारपाल ने कहा प्रभू सुदामा दिनहिन विप्र खुदको सखा आपका बतलाता हे!
बहुत समजाया जिद पर अडा आपसे मिलने लोटकर घर अपने नहीं जाता हे!
सुनते ही बात द्वारपाल की भगवान भक्त से मिलने दोडे आये नंगे पेर!
गले लगाकर सुदामा को रोपडे प्रभू पावं धुल गये सुदामा के लगा अश्रु का ढेर!
ले गये हाथ पकडकर महल के अंदर प्रभू ने स्वयं मित्र को नये वस्त्राभुषण अपने हाथ से पहनाये!
राधा 'रुकमणी के हाथो मधुर पकवान बनवाकर कान्हा स्वयं अपने हाथ से रहे खिलाय!
देखकर द्रश्य ये आसमान से देवगण कर रहे सुमन की बरसात!
रथ मे बिठाकर देवकीनंदन गये सुदामा को घर छोडने लेकर अपने साथ!
देखा परिवर्तन अपने घरका बोले सुदामा कन्हैया क्यों लाये हंसी उडाने तुम मुजे घर पराये!
मुस्कराकर बोले बंसीधर सखा मेरे तुम हो बराबर द्वारिका सा हमने शहर तुम्हारें लिये नये बसाये!
ईस कलियुग मे अब कहां भाई क्रश्न सुदामा सा प्यार!
मां शारदे की दुआ से क्रश्न 'सुदामा की दोस्ती का भाव चित्रण कर रहा बावला भेरु सुनार
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
प्यास पानी ओर उर्म का अंतिम पडाव!
शहर मे ये चिन्तन कहां मन गावं मे लोट जाये नंगे पावं!
मिट्टी के घडो मे मेहनत का प्रतिफल ढका हुआ!
ये भारत का विग्यापित सच हे कर रही सेवा मां मेहनत का फल मिलेगा ईसे पका हुआ!
हकिकत नंगी आंखो से देखो तरक्की के ढोल बजाने वालो!
ये चेहरा हे तुम्हारें सियासी दर्शन का सुविधा की पंतगे उडाने वालो
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
ताश के पत्ते होकर रह गई जिन्दगी!
कभी ईक्का कभी सिर्फ चिडी के सत्ते होके रह गई जिन्दगी!
नुमाईश चेहरो की होने लगी आजकल
महज टुटे साख के पत्ते होके रह गई जिन्दगी!
साहित्य के आकाश मे सितारो की होड हो रही 'सच कहें तो नफरती सिलबट्टे होके रह गई जिन्दगी
No comments:
Post a Comment