Friday, 28 April 2017

शकुन्तला सोनी

👍एक नज़्म ताजा-ताजा👍

🍫"सिरहाने से"🍢

तकिया सिरहाने का
सुनता भी है, कुछ कहता भी है

जो पी चुका है
अनगिनत खारे आँसू
गवाह है मेरे उन
जागते हुए देखे सपनों का
सोते हुए जागे सपनों का
छत को अपलक निहारती
पथराई, अलसती आँखों का
याद आती है मुझे कभी
सिरहाना बनी बाहों की
तकिया, धुले हुए काजल को
सहेजा जिसने बड़े जतन से।
      तकिया सिरहाने का
      सुनता भी है, कुछ कहता भी है।।

थपकी देती हूँ इसे
जैसे यह तुम हो
छुअन देती हूँ इसे
जैसे यह तुम ही हो
प्यार का मीठा पैगाम
जैसे तुम तक पहुँचेगा ही
इसके कानों में फुस फुसा कर
कह जाती हूँ कुछ
जैसे सुन लोगे अभी तुम
फिर कहता है हौले से
बाहें वे लौटेंगी जैसे ही
दूर कहीं चला जाऊँगा।
      तकिया सिरहाने का
      सुनता भी है, कुछ कहता भी है।।

            भावभूमि----
            श्रीमति शकुन्तला सोनी की

            (शब्द --- रामनारायण सोनी)

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