संतों की भी टूटती रही है समाधियां,
सत्ता के भी डोलते रहे हैं सिंहासन..
प्रेम की खनक से,
उन्माद की चमक से..
यही प्रेम……..जब
टेसू को छूकर
जंगलों से आता है,
गरम हवाओं पर तैरता हुआ
एक शीतल एहसास बनकर,
तो जीवंत हो उठती है,
प्रेम की सारी अधखुली कलियां..
खामोश बांसुरियां,
जो अंतस के अबूझ आयामों में
भर देता है जीवन की उर्जा,अक्षत प्रकाश,
और छा जाता है केसरिया रंग
जीवन के बदरंग कैनवास पर,
मेरे मनमीत..
उसी प्रेम की एक बूंद को,
छुपाकर रखा था
मैंने सीप के दायरे में,
डुबो दिया था समन्दर की
अतल गहराईयों में,
आज बनकर निकली है खरा मोती..
प्रेम में पगी वह एक बूंद,
और कर दिया है फिर से सराबोर
मुझे तुम्हारे प्रेम की उसी श्वेत चमक में…ll
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
रोज सुबह केवल,
सूरज ही नहीं निकलता
पहाड़ियों की ओट से
एक गडरिया भी आता है,
पगडंडियों पर
काँधे पर लाठी लेकर
सीना फुलाकर
रेवड़ भूल न जाए रास्ता
रखता वो चौकस निगाहें
क्या सूरज भी
ऐसी रखवाली करता है
किरणों की।
दिनभर सूरज की,
यात्रा के साथ
चलती है उसकी भी यात्रा
पोटली की सूखी रोटियां
नदी से बहता पानी..
विराम देता है उसे ऊर्जा़,
आनंद की अनुभूति
जब सूरज लौट जाता है
पहाड़ियों के पास।
पहाड़ी और पगडंडी में
कहां होती है वार्ता..
कहाँ भेड़ और
पर दोनों की ही यात्रा
होती है प्रतिदिन,
देखा है मैंने कभी
सूरज को जाते हुए
बादलों की ओट में
लेकिन गड़रिया,
कभी नहीं भटकता……….।
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
समुद्र के किनारे रेत पर,
टहलते……….टहलते……
गुनगुनाए जा सकते हैं गीत
उकेरे जा सकते हैं प्रेम संदेश,
या प्रिय का नाम..
पर कौन ले पाता है थाह
समुद्र की गहराई कीl
लहरें केवल सतह ही नहीं होती,
वे मथती रहती हैं..
खुद समुद्र को भी,
गहराई तक दिन और रात..
निकल चुका है मंथन का विष
निकल चुका है मंथन का अमृत,
पर मंथन अब भी जारी है
नहीं चाहता समुद्र भी अब ऐसे वरदान,
फिर भी करता रहता है मंथन..
स्वंय का दिन-रात,
समुद्र अकेले-अकेले-अकेले……।
http://matrubhashaa.com/?p=2510
अन्तःस्थल पर माँ-
माँ
रसोई में
चूल्हे पर
रोटियां सेंकती
मेरी माँ का
लाल लाल दमकता चेहरा
मुझे साहस मेहनत विश्वास
देता है .......।
अंधेरों में
टिमटिमाती ढिबरियों में
मेरी माँ की
चमकती दो आँखे
टपरियों में आने वाले
तूफानों के आघात व्यवघात से
भय मुक्त होने का
मुझे आश्वासन देती हैं......।
कुत्ते भोंकते हैं
बिल्लियां लड़ती हैं
ताले टूटते है
चीखें हवाओं में तैरती है
नदिया लाल होती हैं
आकाश फटता है
धरती रोती है
मेरी माँ के चौकन्ने कान
हरदम मुझे
चौकस कर देते हैं....।
ह्रदय के अन्तःस्थल पर
मेरे बचपन के डर को
जब वह
कस कर दबोच लेती है
स्नेह का बहता अमृत
पुष्ट होता संस्कार
मुझे
चमकते भविष्य का
आभास देते हैं....।
परिवार के किनारों को
सुघड़ता से सँवारते
मेरी माँ के
सधे हुवे ठोस हाथ
उसकी कसी हुई मुट्ठियां
उत्ताल तरंगों में
कुछ न कुछ करने की
तमन्ना
मुझे
विराट सत्य से
स्थापित होने के
तादात्म्य को
ऊर्जा किरणों का
समास देते हैं....।
डॉ सीमा शाहजी
प्राध्यापक हिंदी
325 महात्मा गांधी मार्ग
थांदला जिला झाबुआ
मध्यप्रदेश पिन 457777
जिंदगी में खरोचें है मुझ पर
या फिर मुझे तराशने की कोशिश है
सारा
जीवन
तुम
अज्ञात को
तय करने में
गवाँ देते हो
और
जो
तय हे
उससे
अज्ञात रह जाते हो।
एक - एक दिन सम्हालती हूँ ज़िन्दगी तुझको
एक- एक दिन ही तू हाथों से निकली जाती है
मोम की तरह, हर इक पल पिघलता जाता है
उम्र बरसों के लिफाफों में बदली जाती है
सोचती हूँ हिसाब कर लूँ कभी मिल के ज़रा
ख्वाहिशें टूट के, ख्वाबों में पिघली जाती हैं
उधार सी हुई जाती हैं, सब जीने की वजहें
साँस- दर -साँस किसी कोर ढली जाती है
रंगों की फागुनी दस्तक
फागुन की बयार में हो जाएँ गाल गुलाल
फागुन की बयार धीरे-धीरे बहने लगी है। क्या उसकी अनूठी सरसराहट आप महसूस कर रहे हैं? धरती का माथा अबीर हो गया है, गाल गुलाल हो गए और आँखें लाल। क्या आप देख रहे हैं गाँव-कस्बे की बस्ती में कहीं फाग का संगीत ढोल-मंजीरों से लय पाकर फिजाओं में घुल रहा है। क्या आपके कान सुन रहे हैं? भले ही आपकी आपाधापी में जीवन की मधुरिमा का यह स्पंदन फिलहाल अनसुना... अनदेखा हो गया हो, पर यह सच है कि प्रकृति के आँगन में फागुन ने अपनी उत्सवधर्मी दस्तक दे दी है। उसे आपकी रफ्तार से कोई वास्ता नहीं। फागुन आ गयाहै और पूरे ठाठ के साथ आ गया है।
हम कहाँ से ले आए ये तीज-त्योहार-पर्व। प्रकृति की थाल में सजी ऋतुओं और मौसमी अनुभूतियों को जब जीवन के उल्हास के साथ हमने जीना शुरू किया तो उसे उत्सव का, पर्व का नाम दिया। फागुन पर्व होली भी इस देश की मिट्टी का प्रकृति पर्व है। इसी पर्व के जरिए हम अपनी जमीन के संपन्न संसार में लौटते हैं। जीवन से जुड़ते हैं। विश्व को अपनी पहचान देते हैं।
होली रंगों का त्योहार है। ये तमाम रंग मिलकर हमारी अभिव्यक्ति का प्रतीक बनते हैं। यह उत्सव आत्मा के स्तर पर होता है। किसी त्योहार से यदि हम आत्मिक भाव से नहीं जुड़े तो उसका गाढ़ा रंग हम पर नहीं चढ़ेगा। । होली का प्रत्येक रंग अपना संदर्भ लिए है। लाल रंग प्रीति का है। गुलाबी रंग से उत्साह झलकता है। हरा रंग प्रसन्नता का प्रतीक है। पीला या वासंती रंग संपन्नता का संदेश देता है।सफेद पवित्रता का पर्याय है। काला और बैंगनी वर्जित है। ये मलीनता और पाप के प्रतीक माने जाते हैं। विशेष तौर पर प्रारंभ के पाँच रंगों से होली खेली जाती है।
ये रंग ही विभिन्न भावनाओं के संवाहक है। जब ये रंग एक साथ बरसते हैं तो व्यक्ति का वेश-केश-देश सब एक रंगी हो जाता है। पूरा आदमी रंगों का मिलाजुला पुंज बन जाता है और सारी धरती फागमय हो जाती है। लेकिन इन रंगों की आध्यात्मिक उपस्थिति आज हमारी प्रकृति से नदारद है। न ये रंग भौतिक जीवन में अपना अर्थ कायम रख सके हैं और न ही हमारी अंतरंग अनुभूतियों से उनका गहरा वास्ता रह गया है। न परंपरागत संस्कार और रीति-नीति से!!! एक अनियंत्रित किस्म की हुड़दंग, बेतरतीब शैली और अधकचरी मानसिकता के बीच त्योहार संपन्ना हो जाता है। होली के साथ जुड़ी मान्यताओं को जानने, उनमें रमने का अवकाश और आचरण अब शेष नहीं रहा।
टहलते……….टहलते……
गुनगुनाए जा सकते हैं गीत
उकेरे जा सकते हैं प्रेम संदेश,
या प्रिय का नाम..
पर कौन ले पाता है थाह
समुद्र की गहराई कीl
लहरें केवल सतह ही नहीं होती,
वे मथती रहती हैं..
खुद समुद्र को भी,
गहराई तक दिन और रात..
निकल चुका है मंथन का विष
निकल चुका है मंथन का अमृत,
पर मंथन अब भी जारी है
नहीं चाहता समुद्र भी अब ऐसे वरदान,
फिर भी करता रहता है मंथन..
स्वंय का दिन-रात,
समुद्र अकेले-अकेले-अकेले……।
http://matrubhashaa.com/?p=2510
अन्तःस्थल पर माँ-
माँ
रसोई में
चूल्हे पर
रोटियां सेंकती
मेरी माँ का
लाल लाल दमकता चेहरा
मुझे साहस मेहनत विश्वास
देता है .......।
अंधेरों में
टिमटिमाती ढिबरियों में
मेरी माँ की
चमकती दो आँखे
टपरियों में आने वाले
तूफानों के आघात व्यवघात से
भय मुक्त होने का
मुझे आश्वासन देती हैं......।
कुत्ते भोंकते हैं
बिल्लियां लड़ती हैं
ताले टूटते है
चीखें हवाओं में तैरती है
नदिया लाल होती हैं
आकाश फटता है
धरती रोती है
मेरी माँ के चौकन्ने कान
हरदम मुझे
चौकस कर देते हैं....।
ह्रदय के अन्तःस्थल पर
मेरे बचपन के डर को
जब वह
कस कर दबोच लेती है
स्नेह का बहता अमृत
पुष्ट होता संस्कार
मुझे
चमकते भविष्य का
आभास देते हैं....।
परिवार के किनारों को
सुघड़ता से सँवारते
मेरी माँ के
सधे हुवे ठोस हाथ
उसकी कसी हुई मुट्ठियां
उत्ताल तरंगों में
कुछ न कुछ करने की
तमन्ना
मुझे
विराट सत्य से
स्थापित होने के
तादात्म्य को
ऊर्जा किरणों का
समास देते हैं....।
डॉ सीमा शाहजी
प्राध्यापक हिंदी
325 महात्मा गांधी मार्ग
थांदला जिला झाबुआ
मध्यप्रदेश पिन 457777
जिंदगी में खरोचें है मुझ पर
या फिर मुझे तराशने की कोशिश है
सारा
जीवन
तुम
अज्ञात को
तय करने में
गवाँ देते हो
और
जो
तय हे
उससे
अज्ञात रह जाते हो।
एक - एक दिन सम्हालती हूँ ज़िन्दगी तुझको
एक- एक दिन ही तू हाथों से निकली जाती है
मोम की तरह, हर इक पल पिघलता जाता है
उम्र बरसों के लिफाफों में बदली जाती है
सोचती हूँ हिसाब कर लूँ कभी मिल के ज़रा
ख्वाहिशें टूट के, ख्वाबों में पिघली जाती हैं
उधार सी हुई जाती हैं, सब जीने की वजहें
साँस- दर -साँस किसी कोर ढली जाती है
रंगों की फागुनी दस्तक
फागुन की बयार में हो जाएँ गाल गुलाल
फागुन की बयार धीरे-धीरे बहने लगी है। क्या उसकी अनूठी सरसराहट आप महसूस कर रहे हैं? धरती का माथा अबीर हो गया है, गाल गुलाल हो गए और आँखें लाल। क्या आप देख रहे हैं गाँव-कस्बे की बस्ती में कहीं फाग का संगीत ढोल-मंजीरों से लय पाकर फिजाओं में घुल रहा है। क्या आपके कान सुन रहे हैं? भले ही आपकी आपाधापी में जीवन की मधुरिमा का यह स्पंदन फिलहाल अनसुना... अनदेखा हो गया हो, पर यह सच है कि प्रकृति के आँगन में फागुन ने अपनी उत्सवधर्मी दस्तक दे दी है। उसे आपकी रफ्तार से कोई वास्ता नहीं। फागुन आ गयाहै और पूरे ठाठ के साथ आ गया है।
हम कहाँ से ले आए ये तीज-त्योहार-पर्व। प्रकृति की थाल में सजी ऋतुओं और मौसमी अनुभूतियों को जब जीवन के उल्हास के साथ हमने जीना शुरू किया तो उसे उत्सव का, पर्व का नाम दिया। फागुन पर्व होली भी इस देश की मिट्टी का प्रकृति पर्व है। इसी पर्व के जरिए हम अपनी जमीन के संपन्न संसार में लौटते हैं। जीवन से जुड़ते हैं। विश्व को अपनी पहचान देते हैं।
होली रंगों का त्योहार है। ये तमाम रंग मिलकर हमारी अभिव्यक्ति का प्रतीक बनते हैं। यह उत्सव आत्मा के स्तर पर होता है। किसी त्योहार से यदि हम आत्मिक भाव से नहीं जुड़े तो उसका गाढ़ा रंग हम पर नहीं चढ़ेगा। । होली का प्रत्येक रंग अपना संदर्भ लिए है। लाल रंग प्रीति का है। गुलाबी रंग से उत्साह झलकता है। हरा रंग प्रसन्नता का प्रतीक है। पीला या वासंती रंग संपन्नता का संदेश देता है।सफेद पवित्रता का पर्याय है। काला और बैंगनी वर्जित है। ये मलीनता और पाप के प्रतीक माने जाते हैं। विशेष तौर पर प्रारंभ के पाँच रंगों से होली खेली जाती है।
ये रंग ही विभिन्न भावनाओं के संवाहक है। जब ये रंग एक साथ बरसते हैं तो व्यक्ति का वेश-केश-देश सब एक रंगी हो जाता है। पूरा आदमी रंगों का मिलाजुला पुंज बन जाता है और सारी धरती फागमय हो जाती है। लेकिन इन रंगों की आध्यात्मिक उपस्थिति आज हमारी प्रकृति से नदारद है। न ये रंग भौतिक जीवन में अपना अर्थ कायम रख सके हैं और न ही हमारी अंतरंग अनुभूतियों से उनका गहरा वास्ता रह गया है। न परंपरागत संस्कार और रीति-नीति से!!! एक अनियंत्रित किस्म की हुड़दंग, बेतरतीब शैली और अधकचरी मानसिकता के बीच त्योहार संपन्ना हो जाता है। होली के साथ जुड़ी मान्यताओं को जानने, उनमें रमने का अवकाश और आचरण अब शेष नहीं रहा।

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