"माँ मेरा अभिनन्दन तू"
जीवन का पहला छोर तू ही
जीवन की पहली भोर तू ही
संसृति की सृजन विधाता तू
शीतल करुणा की छाया तू
मेरी अर्चन - पूजन तू।
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
प्रेम पला था तेरे उर में
तब जब मैं जन्मा ही न था
स्वप्न बुने थे तूने तब ही
तब जब मैं अपना ही न था
मेरी अर्चन - पूजन तू
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
मैं गूँगा था, बोल नहीं थे
रिश्तों का कोई बोध नहीं था
जग का पूरा शब्द कोष ही
प्रथम तुझी ने दिया मुझे था।।
मेरी अर्चन - पूजन तू
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
अस्थि चर्म और सारे वय में
तू ही अविरल यूँ बहती है
जैसे नभ के कण-कण में
रंजित पावन पवन रची है।
मेरी अर्चन - पूजन तू
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
मेरा अस्तित्व बनाने के हित
किये आचमन पीड़ा के पल
कैसे मोल चुकाऊँ इसका
नत होता है मस्तक पल-पल
मेरी अर्चन - पूजन तू
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
छूट गई तू बचपन में ही
मै छुप छुप अश्रु बहाता हूँ
हर माँ की सूरत में तब से
मैं तुझे ढूँढता ही रहता हूँ
मेरी अर्चन - पूजन तू
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
💧प्रीत के पाहुन🍂
क्यों हुए आतुर हमारी
नापने गहराई मन की
क्यों छुआ है घाव मेरा
जागती है पीर तन की।
चाँदनी भी चुभ रही है
जो जगाती याद उनकी
कोई चुनरी तान दे अब
तारकों की और तम की।।
सूझता ना पथ कोई भी
गर्दिशों की धुन्ध इसमें
फूल हैं न पात है अब
इस चमन की अंजुमन में।
ये कदम भी आज अँकड़े
वे नहीं हैं जब सफर में
डूबता अभिसार गहरी
क्षोभ की नीरव निशा में।।
दीप की लौ सी किरण भर
रोशनी गलती रही
झर झराते अश्रु कण ले
प्यास ही जगती रही।
आस के नभ में विचरते
स्वाँस के पंछी रुपहले
प्रीत के पाहुन पधारो
प्राण के जाने से पहले।।
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
अपूर्ण-पूर्ण
स्वप्न से शब्द तक
शब्द से अर्थ तक,
फर्श से अर्श तक
अपूर्ण-पूर्ण तुम हुई।
चलो दिगंत घूम लें
प्रखर प्रभात चूम लें,
विराट विश्व की प्रभा
धरा हुई कनक मई।।
चुकी विभावरी तमी
भरा है घट अमी-अमी
प्रपात झर-झरा रहे
हुए वितान चम्पई।।
रोलियाँ बरस रही
भिंगो रही हृदय-जमीं
न मैं रहा अपूर्ण और
अपूर्ण-पूर्ण तुम हुई।।
निवेदक
रामनारायण सोनी
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
😔 कातर क्रन्दन 👩🔬
बहुत लिखा है अब तक हमने
अट्टहास करते दानव को
आग उगलती बन्दूकों और
दो दो मुँह वाले मानव को
मूक हृदय के स्पन्दन को
कान लगा कर सुनना होगा
जिसमें रुदन भरें है अगणित
उन पर मरहम भरना होगा
जहँ स्वप्न अधूरे टूटे हों और
अधर धरे हों प्यास निठुर
जहँ यौवन रीता बीत गया
बन गया जहाँ मधुमास विधुर
जीवन जो जीवित लील रही
संघर्षों की विप्लव धाराएँ
द्वन्दों से जूझ रही हों जहँ
अवशोषित होती बालाएँ
लिखना शेष अभी है हमको
लोचन में प्लावित अश्कों को
करुणा के कातर क्रन्दन और
विगलित तन बुझती पलकों को
रामनारायण सोनी
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
मैं और तुम
प्रश्न हलाहल का ही नही था
मैं तो हँस कर उसको पी गई।
पर तुमको अचरज होता है
क्यों मैं फिर भी जी गई।।
पर उस नीली छत वाले में
मेरा भी विश्वास अटल है।
फिर हर प्याला ही प्रसाद है
अमिय भरा है या कि गरल है।।
तुमने कालकूट को पूजा
मैं तो प्रभु की चरण शरण हूँ।
तुमने गरल बीज बोए हैं
मैं उस प्रभु की प्रीति-वरण हूँ।।
रामनारायण सोनी
नज़्म
डायरी के पृष्ठ बोलते हैं--
पुरानी सी मेरी डायरी के
जर्द पड़ गए पृष्ठों में
पृष्ठों में सियाही जो है
मेरी कलम की ही है, पर
हर शब्द में रूह तुम्हारी ही
सौंधी सी महकती है सुगन्ध बन कर
उन अक्षरों में तुम्हारे तन बदन की
कैसे अजीब संगतराश हैं ये शब्द
मिल कर तुम्हारी सूरत बना देते हैं
एक अक्षर पर चढ़ी बिंदी
उतरी थीं तुम्हारे ही माथे से
और कहीं
सपनीले गुलाबी एक पृष्ठ पर
यादों की लेई से चिपके अक्षर
गूँजते रहते हैं अक्सर
रूह की आवाज बन कर
उस खास कमरे में दिल के
नहीं आता जाता जहाँ कोई और
सुनता हूँ इनको मैं जी भर भर कर
"चुपके चुपके कुछ कहते हैं
आसमान के झिलमिल तारे
भाव भरे है ऐसे ही
देखाे ये शब्द हमारे"
और इसमें कहीं
छुपाया था ताजा ताजा
गुलाबी गुलाब का वह फूल
झड़ गया था कहीं सूख कर
वक्त की डाल से टूटे लम्हे की तरह
पन्ने पर छूटे हुए निशान में
एक चेहरा झाँकता है कनखियों से
कहता मुझे अजनबी की तरह
पूछता है, कौन हो तुम?
और मैं कह उठता हूँ
जिन्दगी की मेरी डायरी
उत्तर देतीं ढेर सारे प्रश्नों के
यहाँ कोई और नहीं,
तुम ही तुम हो,
हाँ केवल तुम ही हो।।
इसमें मौजूद है फिंगर प्रिन्ट
टेसू के चटकीले रंग भरे
फेंके जो पीले, गुलाबी रंग तुमने
अकसर पृष्ठ पर से निकल कर
घुस जाते हैं जेहन में
कर जाते तर बतर तन मन
उदास होता मैं जब कभी
दौड़ता हूँ इन पृष्ठों में इधर से उधर
निकलता हूँ ताजा दम हो कर
जिन्दगी की डायरी है गवाह,
जो जानती है , केवल तुमको
यहाँ कोई और नहीं,
केवल तुम ही तुम हो।।
पुरानी सी मेरी डायरी के
जर्द पड़ गए पृष्ठों में
पृष्ठों में सियाही जो है
मेरी कलम की ही है
मेरी दौलत है, सनद ही है
देख लो! इसमें मैं भी नहीं हूँ
हाँ, यहाँ कोई और नहीं,
केवल तुम ही तुम हो।।
रामनारायण सोनी
2
तुम कितने निष्ठुर हो।
कितने काँटों की फाँस चुभी बैठी पग में
कितने धूल भरे है इस मैले से दामन में
मेरे जीवन की झगुली में पैबन्द सिले कितने
मुझे देख क्यों फेर लिये ये दृग मुझसे तुमने
सचमुच तुम कितने निष्ठुर हो।
रामनारायण सोनी
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