Sunday, 14 May 2017

नीरज पाराशर

*मातृ दिवस*

सब कुछ बदल जाता है
निश्चित समय के बाद
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूं नही है......

जन्म के बाद शिक्षा
रिश्तों का अहसास
प्रकृति से परिचय
सब कुछ चरणबद्ध
सब कुछ मिलने पर भी
यादें फिसलती क्यूँ है
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूँ नही है .......

भूल जाते है हम
पहुँचकर मंजिल पर
मानवीय अहसास को
करते हम शर्मसार
रिश्तों का गला घोंटकर हमें
शर्मिंदगी क्यूँ नही है
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूँ नही है......

शर्मनाक है वर्ष में
एक दिन याद करना
जैसे सूरज से कहना
कि आज तूने धूप दी है
आत्मीय अहसास की
समझ हमे क्यूँ नही है
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूँ नही है....

सब कुछ दिया जो
सम्भव था जग में
तोलने लगते है हम
भावनात्मक अहसास को
रिश्तों के पतन का अहसास
हमे क्यूँ नही है
पर माँ तेरी ममता
बदलती क्यूँ नही है......

                 *नीरज पाराशर*
              सीईओ जनपद खण्डवा

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